रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्॥ १॥
rāmaṃ kāmārisevyaṃ bhavabhayaharaṇaṃ kālamattebhasiṃhaṃ yogīndraṃ jñānagamyaṃ guṇanidhimajitaṃ nirguṇaṃ nirvikāram|
māyātītaṃ sureśaṃ khalavadhanirataṃ brahmavṛndaikadevaṃ vande kandāvadātaṃ sarasijanayanaṃ devamurvīśarūpam|| 1||
Meaning कामदेवके शत्रु शिवजीके सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भयको हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहके समान, योगियोंके स्वामी (योगीश्वर), ज्ञानके द्वारा जानने योग्य, गुणोंकी निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, मायासे परे, देवताओंके स्वामी, दुष्टोंके वधमें तत्पर, ब्राह्मणवृन्दके एकमात्र देवता (रक्षक), जलवाले मेघके समान सुन्दर श्याम, कमलके-से नेत्रवाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूपमें परमदेव श्रीरामजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥
शङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम्।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्॥ २॥
śaṅkhendvābhamatīvasundaratanuṃ śārdūlacarmāmbaraṃ kālavyālakarālabhūṣaṇadharaṃ gaṅgāśaśāṅkapriyam|
kāśīśaṃ kalikalmaṣaughaśamanaṃ kalyāṇakalpadrumaṃ naumīḍyaṃ girijāpatiṃ guṇanidhiṃ kandarpahaṃ śaṅkaram|| 2||
Meaning शड्ढ और चन्द्रमाकी-सी कान्तिके अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले, व्याघ्रचर्मके वस्त्रवाले, कालके समान [अथवा काले रंगके] भयानक सर्पोंका भूषण धारण करनेवाले, गड़ा और चन्द्रमाके प्रेमी, काशीपति, कलियुगके पाप-समूहका नाश करनेवाले, कल्याणके कल्पवृक्ष, गुणोंके निधान और कामदेवको भस्म करनेवाले पार्वतीपति वन्दनीय श्रीशड्टरजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे॥ ३॥
yo dadāti satāṃ śambhuḥ kaivalyamapi durlabham|
khalānāṃ daṇḍakṛdyo'sau śaṅkaraḥ śaṃ tanotu me|| 3||
Meaning जो सत्पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ कैवल्यमुक्तितक दे डालते हैं और जो दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी श्रीशम्भु मेरे कल्याणका विस्तार करें॥ ३॥
लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥
lava nimeṣa paramānu juga baraṣa kalapa sara caṃḍa|
bhajasi na mana tehi rāma ko kālu jāsu kodaṃḍa||
Meaning लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता ?
सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरे कटकु॥
siṃdhu bacana suni rāma saciva boli prabhu asa kaheu|
aba bilaṃbu kehi kāma karahu setu utare kaṭaku||
Meaning समुद्रके वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजीने मन्त्रियोंको बुलाकर ऐसा कहा--अब विलम्ब किसलिये हो रहा है? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं॥
sunahu bhānukula ketu jāmavaṃta kara jori kaha|
nātha nāma tava setu nara caṛhi bhava sāgara tarahiṃ||
Meaning जाम्बवानूने हाथ जोड़कर कहा--हे सूर्यकुलके ध्वजा-स्वरूप ( कीर्तिको बढ़ानेवाले ) श्रीरामजी ! सुनिये। हे नाथ! [सबसे बड़ा] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसाररूपी समुद्रसे पार हो जाते हैं।
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा॥
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥
yaha laghu jaladhi tarata kati bārā| asa suni puni kaha pavanakumārā||
prabhu pratāpa baṛavānala bhārī| soṣeu prathama payonidhi bārī||
Meaning फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करनेमें कितनी देर लगेगी ? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमानूजीने कहा--प्रभुका प्रताप भारी बड़वानल (समुद्रकी आग) के समान है। इसने पहले समुद्रके जलको सोख लिया था॥ १॥
तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा॥
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी॥
taba ripu nārī rudana jala dhārā| bhareu bahori bhayau tehiṃ khārā||
suni ati ukuti pavanasuta kerī| haraṣe kapi raghupati tana herī||
Meaning परन्तु आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसीसे खारा भी हो गया। हनुमानूजीको यह अत्युक्ति (अलड्ारपूर्ण युक्ति) सुनकर वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर हर्षित हो गये॥ २॥
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥
jāmavaṃta bole dou bhāī| nala nīlahi saba kathā sunāī||
rāma pratāpa sumiri mana māhīṃ| karahu setu prayāsa kachu nāhīṃ||
Meaning जाम्बवानूने नल-नील दोनों भाइयोंको बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायी [और कहा--] मनमें श्रीरामजीके प्रतापको स्मरण करके सेतु तैयार करो, [ रामप्रतापसे] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा॥ ३॥
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी॥
राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू॥
boli lie kapi nikara bahorī| sakala sunahu binatī kachu morī||
rāma carana paṃkaja ura dharahū| kautuka eka bhālu kapi karahū||
Meaning फिर वानरोंके समूहको बुला लिया [और कहा--] आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये। अपने हृदयमें श्रीरामजीके चरण-कमलोंको धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये॥ ४॥
धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥
सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥
dhāvahu markaṭa bikaṭa barūthā| ānahu biṭapa girinha ke jūthā||
suni kapi bhālu cale kari hūhā| jaya raghubīra pratāpa samūhā||
Meaning विकट वानरोंके समूह (आप) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतोंके समूहोंको उखाड़ लाइये। यह सुनकर वानर और भालू हृह (हुंकार) करके और श्रीरघुनाथजीके प्रतापसमूहकी [अथवा प्रतापके पुंज श्रीरामजीकी] जय पुकारते हुए चले॥ ५॥
अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥ १॥
ati utaṃga giri pādapa līlahiṃ lehiṃ uṭhāi|
āni dehiṃ nala nīlahi racahiṃ te setu banāi|| 1||
Meaning बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षोंको खेलकी तरह ही [उखाड़कर] उठा लेते हैं और ला- लाकर नल-नीलको देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर [सुन्दर] सेतु बनाते हैं॥ १॥
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥
देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥
saila bisāla āni kapi dehīṃ| kaṃduka iva nala nīla te lehīṃ||
dekhi setu ati suṃdara racanā| bihasi kṛpānidhi bole bacanā||
Meaning वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंदकी तरह ले लेते हैं। सेतुकी अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीरामजी हँसकर वचन बोले--॥ १॥
परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥
करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना॥
parama ramya uttama yaha dharanī| mahimā amita jāi nahiṃ baranī||
karihaum̐ ihām̐ saṃbhu thāpanā| more hṛdayam̐ parama kalapanā||
Meaning यह (यहाँकी) भूमि परम रमणीय और उत्तम है। इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिवजीकी स्थापना करूँगा। मेरे हदयमें यह महान् संकल्प है॥ २॥
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए॥
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
suni kapīsa bahu dūta paṭhāe| munibara sakala boli lai āe||
liṃga thāpi bidhivata kari pūjā| siva samāna priya mohi na dūjā||
Meaning श्रीरामजीके वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने बहुत-से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियोंको बुलाकर ले आये। शिवलिड्की स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया। [फिर भगवान् बोले--] शिवजीके समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है॥ ३॥
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥
siva drohī mama bhagata kahāvā| so nara sapanehum̐ mohi na pāvā||
saṃkara bimukha bhagati caha morī| so nārakī mūṛha mati thorī||
Meaning जो शिवसे द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्रमें भी मुझे नहीं पाता। शड्धरजीसे विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है॥ ४॥
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास॥ २॥
saṃkara priya mama drohī siva drohī mama dāsa|
te nara karahi kalapa bhari dhora naraka mahum̐ bāsa|| 2||
Meaning जिनको शड्जूरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं; एवं जो शिवजीके द्रोही हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरकमें निवास करते हैं॥ २॥
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥
je rāmesvara darasanu karihahiṃ| te tanu taji mama loka sidharihahiṃ||
jo gaṃgājalu āni caṛhāihi| so sājujya mukti nara pāihi||
Meaning जो मनुष्य [मेरे स्थापित किये हुए इन] रामेधरजीका दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोकको जायँगे। और जो गड़ाजल लाकर इनपर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा ( अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा)॥ १॥
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥
hoi akāma jo chala taji seihi| bhagati mori tehi saṃkara deihi||
mama kṛta setu jo darasanu karihī| so binu śrama bhavasāgara tarihī||
Meaning जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेशरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शड्धरजी मेरी भक्ति देंगे। और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा॥ २॥
राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए॥
गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती॥
rāma bacana saba ke jiya bhāe| munibara nija nija āśrama āe||
girijā raghupati kai yaha rītī| saṃtata karahiṃ pranata para prītī||
Meaning श्रीरामजीके वचन सबके मनको अच्छे लगे। तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमोंको लौट आये। [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! श्रीरघुनाथजीकी यह रीति है कि वे शरणागतपर सदा प्रीति करते हैं॥ ३॥
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई॥
bām̐dhā setu nīla nala nāgara| rāma kṛpām̐ jasu bhayau ujāgara||
būṛahiṃ ānahi borahiṃ jeī| bhae upala bohita sama teī||
Meaning चतुर नल और नीलने सेतु बाँधा। श्रीरामजीकी कृपासे उनका यह [उज्चल] यश सर्वत्र फैल गया। जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरोंको डुबा देते हैं, वे ही जहाजके समान [स्वयं तैरनेवाले और दूसरोंको पार ले जानेवाले] हो गये॥ ४॥
महिमा यह न जलधि कइ बरनी।
पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी॥
mahimā yaha na jaladhi kai baranī| pāhana guna na kapinha kai karanī||
Meaning यह न तो समुद्रकी महिमा वर्णन की गयी है, न पत्थरोंका गुण है और न वानरोंकी ही कोई करामात है॥ ५॥
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥ ३॥
śrī raghubīra pratāpa te siṃdhu tare pāṣāna|
te matimaṃda je rāma taji bhajahiṃ jāi prabhu āna|| 3||
Meaning श्रीरघुबीरके प्रतापसे पत्थर भी समुद्रपर तैर गये। ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं वे [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं॥ ३॥
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा॥
चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई॥
bām̐dhi setu ati sudṛṛha banāvā| dekhi kṛpānidhi ke mana bhāvā||
calī sena kachu barani na jāī| garjahiṃ markaṭa bhaṭa samudāī||
Meaning नल-नीलने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया। देखनेपर वह कृपानिधान श्रीरामजीके मनको [बहुत ही] अच्छा लगा। सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता। योद्धा वानरोंके समुदाय गरज रहे हैं॥ १॥
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई॥
देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा॥
setubaṃdha ḍhiga caṛhi raghurāī| citava kṛpāla siṃdhu bahutāī||
dekhana kahum̐ prabhu karunā kaṃdā| pragaṭa bhae saba jalacara bṛṃdā||
Meaning कृपालु श्रीरघुनाथजी सेतुबन्धके तटपर चढ़कर समुद्रका विस्तार देखने लगे। करुणाकन्द (करुणाके मूल) प्रभुके दर्शनके लिये सब जलचरोंके समूह प्रकट हो गये (जलके ऊपर निकल आये)॥ २॥
मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥
makara nakra nānā jhaṣa byālā| sata jojana tana parama bisālā||
aiseu eka tinhahi je khāhīṃ| ekanha keṃ ḍara tepi ḍerāhīṃ||
Meaning बहुत तरहके मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजनके बहुत बड़े विशाल शरीर थे। कुछ ऐसे भी जन्तु थे जो उनको भी खा जायँ। किसी-किसीके डरसे तो वे भी डर रहे थे॥ ३॥
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे॥
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी॥
prabhuhi bilokahiṃ ṭarahiṃ na ṭāre| mana haraṣita saba bhae sukhāre||
tinha kī oṭa na dekhia bārī| magana bhae hari rūpa nihārī||
Meaning वे सब [वैर-विरोध भूलकर] प्रभुके दर्शन कर रहे हैं, हटानेसे भी नहीं हटते। सबके मन हर्षित हैं; सब सुखी हो गये। उनकी आड़के कारण जल नहीं दिखायी पड़ता। वे सब भगवान्का रूप देखकर [आनन्द और प्रेममें] मगर हो गये॥ ४॥
चला कटकु प्रभु आयसु पाई।
को कहि सक कपि दल बिपुलाई॥
calā kaṭaku prabhu āyasu pāī| ko kahi saka kapi dala bipulāī||
Meaning प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर सेना चली। वानर-सेनाकी विपुलता (अत्यधिक संख्या ) को कौन कह सकता है?॥५॥
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥ ४॥
setubaṃdha bhai bhīra ati kapi nabha paṃtha uṛāhiṃ|
apara jalacaranhi ūpara caṛhi caṛhi pārahi jāhiṃ|| 4||
Meaning सेतुबन्धपर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्गसे उड़ने लगे और दूसरे [कितने ही] जलचर जीवोंपर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं॥ ४॥
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥
सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥
asa kautuka biloki dvau bhāī| biham̐si cale kṛpāla raghurāī||
sena sahita utare raghubīrā| kahi na jāi kapi jūthapa bhīrā||
Meaning कृपालु रघुनाथजी [ तथा लक्ष्मणजी ] दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हँसते हुए चले। श्रीरघुवीर सेनासहित समुद्रके पार हो गये। वानरों और उनके सेनापतियोंकी भीड़ कही नहीं जा सकती॥ १॥
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए॥
siṃdhu pāra prabhu ḍerā kīnhā| sakala kapinha kahum̐ āyasu dīnhā||
khāhu jāi phala mūla suhāe| sunata bhālu kapi jaham̐ taham̐ dhāe||
Meaning प्रभुने समुद्रके पार डेरा डाला और सब वानरोंको आज्ञा दी कि तुम जाकर सुन्दर फल-मूल खाओ। यह सुनते ही रीछ-वानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े॥ २॥
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी॥
खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं॥
saba taru phare rāma hita lāgī| ritu aru kuritu kāla gati tyāgī||
khāhiṃ madhura phala baṭapa halāvahiṃ| laṃkā sanmukha sikhara calāvahiṃ||
Meaning श्रीरामजीके हित (सेवा) के लिये सब वृक्ष ऋतु-कुऋतु--समयकी गतिको छोड़कर फल उदठे। वानर-भालू मीठे-मीठे फल खा रहे हैं, वृक्षोंको हिला रहे हैं और पर्वतोंके शिखरोंको लड़्ाकी ओर फेंक रहे हैं॥ ३॥
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं॥
दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना॥
jaham̐ kahum̐ phirata nisācara pāvahiṃ| gheri sakala bahu nāca nacāvahiṃ||
dasananhi kāṭi nāsikā kānā| kahi prabhu sujasu dehiṃ taba jānā||
Meaning घूमते-फिरते जहाँ कहीं किसी राक्षसको पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच नचाते हैं और दाँतोंसे उसके नाक-कान काटकर, प्रभुका सुयश कहकर [ अथवा कहलाकर] तब उसे जाने देते हैं॥ ४॥
जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता॥
सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना॥
jinha kara nāsā kāna nipātā| tinha rāvanahi kahī saba bātā||
sunata śravana bāridhi baṃdhānā| dasa mukha boli uṭhā akulānā||
Meaning जिन राक्षसोंके नाक और कान काट डाले गये, उन्होंने रावणसे सब समाचार कहा। समुद्र [पर सेतु] का बाँधा जाना कानोंसे सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखोंसे बोल उठा--॥५॥
बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥ ५॥
bāṃdhyo bananidhi nīranidhi jaladhi siṃdhu bārīsa|
satya toyanidhi kaṃpati udadhi payodhi nadīsa|| 5||
Meaning वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीशको क्या सचमुच ही बाँध लिया 2॥५॥
निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी॥
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो॥
nija bikalatā bicāri bahorī| biham̐si gayau graha kari bhaya bhorī||
maṃdodarīṃ sunyo prabhu āyo| kautukahīṃ pāthodhi bam̐dhāyo||
Meaning फिर. अपनी व्याकुलताको समझकर [ऊपरसे] हँसता हुआ, भयको भुलाकर रावण महलको गया। [जब] मन्दोदरीने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गये हैं और उन्होंने खेलमें ही समुद्रको बँधवा लिया है,॥ १॥
कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी॥
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥
kara gahi patihi bhavana nija ānī| bolī parama manohara bānī||
carana nāi siru aṃcalu ropā| sunahu bacana piya parihari kopā||
Meaning [तब] वह हाथ पकड़कर, पतिको अपने महलमें लाकर परम मनोहर वाणी बोली। चरणोंमें सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा--हे प्रियतम! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये॥ २॥
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥
nātha bayaru kīje tāhī soṃ| budhi bala sakia jīti jāhī soṃ||
tumhahi raghupatihi aṃtara kaisā| khalu khadyota dinakarahi jaisā||
Meaning हे नाथ! वैर उसीके साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बलके द्वारा जीत सके। आपपें और श्रीरघुनाथजीमें निश्चय ही कैसा अन्तर है, जैसा जुगनू और सूर्यमें !॥ ३॥
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे॥
जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा॥
atibala madhu kaiṭabha jehiṃ māre| mahābīra ditisuta saṃghāre||
jehiṃ bali bām̐dhi sahajabhuja mārā| soi avatareu harana mahi bhārā||
Meaning जिन्होंने [विष्णुरूपसे] अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ [दैत्य] मारे और [वाराह और नृसिंहरूपसे] महान् शूरवीर दितिके पुत्रों ( हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) का संहार किया; जिन्होंने [वामनरूपसे] बलिको बाँधा और [ परशुरामरूपसे ] सहस्रबाहुको मारा, वे ही [ भगवान्] पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये [रामरूपमें] अवतीर्ण (प्रकट) हुए हैं !॥ ४॥
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा।
काल करम जिव जाकें हाथा॥
tāsu birodha na kījia nāthā| kāla karama jiva jākeṃ hāthā||
Meaning हे नाथ! उनका विरोध न कीजिये, जिनके हाथमें काल, कर्म और जीव सभी हैं॥५॥
रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥ ६॥
rāmahi saupi jānakī nāi kamala pada mātha|
suta kahum̐ rāja samarpi bana jāi bhajia raghunātha|| 6||
Meaning [ श्रीरामजीके] चरणकमलोंमें सिर नवाकर (उनकी शरणमें जाकर) उनको जानकीजी सौंप दीजिये और आप पुत्रको राज्य देकर वनमें जाकर श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये॥ ६॥
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई॥
चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते॥
nātha dīnadayāla raghurāī| bāghau sanamukha gaem̐ na khāī||
cāhia karana so saba kari bīte| tumha sura asura carācara jīte||
Meaning हे नाथ! श्रीरघुनाथजी तो दीनोंपर दया करनेवाले हैं। सम्मुख (शरण) जानेपर तो बाघ भी नहीं खाता। आपको जो कुछ करना चाहिये था, वह सब आप कर चुके। आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभीको जीत लिया॥ १॥
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥
तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता॥
saṃta kahahiṃ asi nīti dasānana| cautheṃpana jāihi nṛpa kānana||
tāsu bhajana kījia taham̐ bhartā| jo kartā pālaka saṃhartā||
Meaning हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये। हे स्वामी ! वहाँ (वनमें ) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं॥ २॥
सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी॥
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी॥
soi raghuvīra pranata anurāgī| bhajahu nātha mamatā saba tyāgī||
munibara jatanu karahiṃ jehi lāgī| bhūpa rāju taji hohiṃ birāgī||
Meaning हे नाथ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्का भजन कीजिये। जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं--॥ ३॥
सोइ कोसलधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया॥
जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन॥
soi kosaladhīsa raghurāyā| āyau karana tohi para dāyā||
jauṃ piya mānahu mora sikhāvana| sujasu hoi tihum̐ pura ati pāvana||
Meaning वही कोसलाधीश श्रीरघुनाथजी आपपर दया करने आये हैं। हे प्रियतम ! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यन्त पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकोंमें फैल जायगा॥ ४॥
अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात।
नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात॥ ७॥
asa kahi nayana nīra bhari gahi pada kaṃpita gāta|
nātha bhajahu raghunāthahi acala hoi ahivāta|| 7||
Meaning ऐसा कहकर, नेत्रोंगें [ करुणाका] जल भरकर और पतिके चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीरसे मन्दोदरीने कहा--हे नाथ! श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय॥ ७॥
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई॥
सुनु तै प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥
taba rāvana mayasutā uṭhāī| kahai lāga khala nija prabhutāī||
sunu tai priyā bṛthā bhaya mānā| jaga jodhā ko mohi samānā||
Meaning तब रावणने मन्दोदरीको उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा--हे प्रिये ! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगतमें मेरे समान योद्धा है कौन ?॥ १॥
बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला॥
देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें॥
baruna kubera pavana jama kālā| bhuja bala jiteum̐ sakala digapālā||
deva danuja nara saba basa moreṃ| kavana hetu upajā bhaya toreṃ||
Meaning वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालोंको तथा कालको भी मैंने अपनी भुजाओंके बलसे जीत रखा है। देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वशमें हैं। फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया?॥ २॥
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥
मंदोदरीं हदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥
nānā bidhi tehi kahesi bujhāī| sabhām̐ bahori baiṭha so jāī||
maṃdodarīṃ hadayam̐ asa jānā| kāla basya upajā abhimānā||
Meaning मन्दोदरीने उसे बहुत तरहसे समझाकर कहा [किन्तु रावणने उसकी एक भी बात न सुनी] और वह फिर सभामें जाकर बैठ गया। मन्दोदरीने हृदयमें ऐसा जान लिया कि कालके वश होनेसे पतिको अभिमान हो गया है॥ ३॥
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा॥
कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा॥
sabhām̐ āi maṃtrinha teṃhi būjhā| karaba kavana bidhi ripu saiṃ jūjhā||
kahahiṃ saciva sunu nisicara nāhā| bāra bāra prabhu pūchahu kāhā||
Meaning सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि शत्रुके साथ किस प्रकारसे युद्ध करना होगा? मन्त्र कहने लगे--हे राक्षसोंके नाथ! हे प्रभु! सुनिये, आप बार-बार क्या पूछते हैं ?॥ ४॥
कहहु कवन भय करिअ बिचारा।
नर कपि भालु अहार हमारा॥
kahahu kavana bhaya karia bicārā| nara kapi bhālu ahāra hamārā||
Meaning कहिये तो [ऐसा] कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाय? ( भयकी बात ही क्या है?) मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन [की सामग्री] हैं॥५॥
सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।
निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि॥ ८॥
saba ke bacana śravana suni kaha prahasta kara jori|
niti birodha na karia prabhu matriṃnha mati ati thori|| 8||
Meaning कानोंसे सबके वचन सुनकर [रावणका पुत्र प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा--हे प्रभु! नीतिके विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिये, मन्त्रियोंमें बहुत ही थोड़ी बुद्धि है॥ ८॥
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥
बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥
kahahiṃ saciva saṭha ṭhakurasohātī| nātha na pūra āva ehi bhām̐tī||
bāridhi nāghi eka kapi āvā| tāsu carita mana mahum̐ sabu gāvā||
Meaning ये सभी मूर्ख (खुशामदी ) मन्त्री ठकुरसुहाती (मुँहदेखी ) कह रहे हैं। हे नाथ! इस प्रकारकी बातोंसे पूरा नहीं पड़ेगा। एक ही बंदर समुद्र लॉघकर आया था। उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं (स्मरण किया करते हैं)॥ १॥
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू॥
सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा॥
chudhā na rahī tumhahi taba kāhū| jārata nagaru kasa na dhari khāhū||
sunata nīka āgeṃ dukha pāvā| sacivana asa mata prabhuhi sunāvā||
Meaning उस समय तुमलोगोंमेंसे किसीको भूख न थी ? [बंदर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर] नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया ? इन म्त्रियोंने स्वामी (आप) को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुननेमें अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुःख पाना होगा॥ २॥
जेहिं बारीस बँधायउ हेला।
उतरेउ सेन समेत सुबेला॥
jehiṃ bārīsa bam̐dhāyau helā| utareu sena sameta subelā||
सो भनु मनुज खाब हम भाई।
बचन कहहिं सब गाल फुलाई॥
so bhanu manuja khāba hama bhāī| bacana kahahiṃ saba gāla phulāī||
Meaning जिसने खेल-ही-खेलमें समुद्र बँधा लिया और जो सेनासहित सुबेल पर्वतपर आ उतरा। हे भाई! कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे ? सब गाल फुला-फुलाकर ( पागलोंकी तरह) वचन कह रहे हैं!॥ ३॥
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर॥
प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं॥
tāta bacana mama sunu ati ādara| jani mana gunahu mohi kari kādara||
priya bānī je sunahiṃ je kahahīṃ| aise nara nikāya jaga ahahīṃ||
Meaning हे तात! मेरे वचनोंको बहुत आदरसे (बड़े गौरसे) सुनिये। मुझे मनमें कायर न समझ लीजियेगा। जगतमें ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड॒ (बहुत अधिक) हैं, जो प्यारी (मुँहपर मीठी लगनेवाली) बात ही सुनते और कहते हैं॥ ४॥
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥
bacana parama hita sunata kaṭhore| sunahiṃ je kahahiṃ te nara prabhu thore||
prathama basīṭha paṭhau sunu nītī| sītā dei karahu puni prītī||
Meaning हे प्रभो ! सुननेमें कठोर परन्तु [ परिणाममें] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। नीति सुनिये, [उसके अनुसार] पहले दूत भेजिये, और [फिर] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति [मेल] कर लीजिये॥ ५॥
नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि।
नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि॥ ९॥
nāri pāi phiri jāhiṃ jauṃ tau na baṛhāia rāri|
nāhiṃ ta sanmukha samara mahi tāta karia haṭhi māri|| 9||
Meaning यदि वे स्त्री पाकर लौट जायेँ, तब तो [व्यर्थ] झगड़ा न बढ़ाइये। नहीं तो (यदि न फिरें तो) हे तात! सम्मुख युद्धभूमिमें उनसे हठपूर्वक (डटकर) मार-काट कीजिये॥ ९॥
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा॥
सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई॥
yaha mata jauṃ mānahu prabhu morā| ubhaya prakāra sujasu jaga torā||
suta sana kaha dasakaṃṭha risāī| asi mati saṭha kehiṃ tohi sikhāī||
Meaning हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो. जगतमें दोनों ही. प्रकारसे आपका सुयश होगा। रावणने गुस्सेमें भरकर पुत्रसे कहा--अरे मूर्ख! तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी ?॥ १॥
अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई॥
सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा॥
abahīṃ te ura saṃsaya hoī| benumūla suta bhayahu ghamoī||
suni pitu girā paruṣa ati ghorā| calā bhavana kahi bacana kaṭhorā||
Meaning अभीसे हृदयमें सन्देह (भय) हो रहा है? हे पुत्र! तू तो बाँसकी जड़में घमोई हुआ (तू मेरे वंशके अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ)। पिताकी अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घरको चला गया॥ २॥
हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥
संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा॥
hita mata tohi na lāgata kaiseṃ| kāla bibasa kahum̐ bheṣaja jaiseṃ||
saṃdhyā samaya jāni dasasīsā| bhavana caleu nirakhata bhuja bīsā||
Meaning हितकी सलाह आपको कैसे नहीं लगती (आपपर कैसे असर नहीं करती), जैसे मृत्युके वश हुए [रोगी] को दवा नहीं लगती। सन्ध्याका समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओंको देखता हुआ महलको चला॥ ३॥
लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा॥
बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन॥
laṃkā sikhara upara āgārā| ati bicitra taham̐ hoi akhārā||
baiṭha jāi tehī maṃdira rāvana| lāge kiṃnara guna gana gāvana||
Meaning लंकाकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था। वहाँ नाच-गानका अखाड़ा जमता था। रावण उस महलमें जाकर बैठ गया। किन्नर उसके गुणसमूहोंको गाने लगे॥ ४॥
बाजहिं ताल पखाउज बीना।
नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना॥
bājahiṃ tāla pakhāuja bīnā| nṛtya karahiṃ apacharā prabīnā||
Meaning ताल (करताल), पखावज (मृदंग) और वीणा बज रहे हैं। नृत्यमें प्रवीण अप्सराएँ नाच रही हैं॥ ५॥
सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास॥ १०॥
sunāsīra sata sarisa so saṃtata karai bilāsa|
parama prabala ripu sīsa para tadyapi soca na trāsa|| 10||
Meaning वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलास करता रहता है। यद्यपि [ श्रीरामजी-सरीखा ] अत्यन्त प्रबल शत्रु सिरपर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है॥ १०॥
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥
सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥
ihām̐ subela saila raghubīrā| utare sena sahita ati bhīrā||
sikhara eka utaṃga ati dekhī| parama ramya sama subhra biseṣī||
Meaning यहाँ श्रीरघुवीर सुबेल पर्वतपर सेनाकी बड़ी भीड़ (बड़े समूह) के साथ उतरे। पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्वल शिखर देखकर--॥ १॥
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥
ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला॥
taham̐ taru kisalaya sumana suhāe| lachimana raci nija hātha ḍasāe||
tā para rūcira mṛdula mṛgachālā| tehīṃ āsāna āsīna kṛpālā||
Meaning वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये। उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे॥ २॥
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥
दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥
prabhu kṛta sīsa kapīsa uchaṃgā| bāma dahina disi cāpa niṣaṃgā||
duhum̐ kara kamala sudhārata bānā| kaha laṃkesa maṃtra lagi kānā||
Meaning प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं। उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [रखा] है। वे अपने दोनों कर-कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं॥ ३॥
बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना॥
प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन॥
baṛabhāgī aṃgada hanumānā| carana kamala cāpata bidhi nānā||
prabhu pācheṃ lachimana bīrāsana| kaṭi niṣaṃga kara bāna sarāsana||
Meaning परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान् अनेकों प्रकारसे प्रभुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं॥ ४॥
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन॥ ११ ( क )॥
ehi bidhi kṛpā rūpa guna dhāma rāmu āsīna|
dhanya te nara ehiṃ dhyāna je rahata sadā layalīna|| 11 ( ka )||
Meaning इस प्रकार कृपा, रूप (सौन्दर्य) और गुणोंके धाम श्रीरामजी विराजमान हैं। वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इस ध्यानमें लौ लगाये रहते हैं॥ ११ (क)॥
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक॥ ११ ( ख )॥
pūraba disā biloki prabhu dekhā udita maṃyaka|
kahata sabahi dekhahu sasihi mṛgapati sarisa asaṃka|| 11 ( kha )||
Meaning पूर्व दिशाकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामजीने चन्द्रमाको उदय हुआ देखा। तब वे सबसे कहने लगे-चन्द्रमाको तो देखो। कैसा सिंहके समान निडर है!॥ ११ (ख)॥
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥
pūraba disi giriguhā nivāsī| parama pratāpa teja bala rāsī||
matta nāga tama kuṃbha bidārī| sasi kesarī gagana bana cārī||
Meaning पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बलकी राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथीके मस्तकको विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है॥ १॥
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥
bithure nabha mukutāhala tārā| nisi suṃdarī kera siṃgārā||
kaha prabhu sasi mahum̐ mecakatāī| kahahu kāha nija nija mati bhāī||
Meaning आकाशमें बिखरे हुए तारे मोतियोंके समान हैं, जो रात्रिरूपी सुन्दर स्त्रीके श्रुज्धार हैं। प्रभुने कहा--भाइयो! चन्द्रमामें जो कालापन है वह क्या है ? अपनी-अपनी बुद्धिकि अनुसार कहो॥ २॥
कह सुग़ीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई॥
मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई॥
kaha suġīva sunahu raghurāī| sasi mahum̐ pragaṭa bhūmi kai jhām̐ī||
māreu rāhu sasihi kaha koī| ura maham̐ parī syāmatā soī||
Meaning सुग्रीवने कहा--हे रघुनाथजी ! सुनिये। चन्द्रमामें पृथ्वीकी छाया दिखायी दे रही है। किसीने कहा-चन्द्रमाको राहुने मारा था। वही [चोटका] काला दाग हृदयपर पड़ा हुआ है॥ ३॥
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥
kou kaha jaba bidhi rati mukha kīnhā| sāra bhāga sasi kara hari līnhā||
chidra so pragaṭa iṃdu ura māhīṃ| tehi maga dekhia nabha parichāhīṃ||
Meaning कोई कहता है--जब ब्रह्माने [ कामदेवकी स्त्री ] रतिका मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया [जिससे रतिका मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमाके हृदयमें छेद हो गया]। वही छेद चन्द्रमाके हृदयमें वर्तमान है, जिसकी राहसे आकाशकी काली छाया उसमें दिखायी पड़ती है॥ ४॥
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥
बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी॥
prabhu kaha garala baṃdhu sasi kerā| ati priya nija ura dīnha baserā||
biṣa saṃjuta kara nikara pasārī| jārata birahavaṃta nara nārī||
Meaning प्रभु श्रीरामजीने कहा--विष चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है। इसीसे उसने विषको अपने हृदयमें स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरणसमूहको फैलाकर वह वियोगी नर-नारियोंको जलाता रहता है॥५॥
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास।
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास॥ १२ ( क )॥
kaha hanumaṃta sunahu prabhu sasi tumhārā priya dāsa|
tava mūrati bidhu ura basati soi syāmatā abhāsa|| 12 ( ka )||
Meaning हनुमान्ूजीने कहा--हे प्रभो! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमाके हृदयमें बसती है, वही श्यामताकी झलक चन्द्रमामें है॥ १२ (क)॥
पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान।
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान॥ १२ ( ख )॥
pavana tanaya ke bacana suni biham̐se rāmu sujāna|
dacchina disi avaloki prabhu bole kṛpā nidhāna|| 12 ( kha )||
Meaning पवनपुत्र हनुमानूजीके वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे। फिर दक्षिणकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले--॥ १२ (ख)॥
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा॥
मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥
dekhu bibhīṣana dacchina āsā| ghana ghaṃmaḍa dāmini bilāsā||
madhura madhura garajai ghana ghorā| hoi bṛṣṭi jani upala kaṭhorā||
Meaning हे विभीषण! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे (हलके-हलके) स्वरसे गरज रहा है। कहीं कठोर ओलोंकी वर्षा नहो!॥१॥
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला॥
लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा॥
kahata bibhīṣana sunahu kṛpālā| hoi na taṛita na bārida mālā||
laṃkā sikhara upara āgārā| taham̐ dasakaṃghara dekha akhārā||
Meaning विभीषण बोले--हे कृपालु! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा। लंकाकी चोटीपर एक महल है। दशग्रीव रावण वहाँ [नाच-गानका] अखाड़ा देख रहा है॥ २॥
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी॥
मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥
chatra meghaḍaṃbara sira dhārī| soi janu jalada ghaṭā ati kārī||
maṃdodarī śravana tāṭaṃkā| soi prabhu janu dāminī damaṃkā||
Meaning रावणने सिरपर मेघडंबर (बादलोंके डंबर-जैसा विशाल और काला) छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलोंकी अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरीके कानोंमें जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो ! वही मानो बिजली चमक रही है॥ ३॥
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥
bājahiṃ tāla mṛdaṃga anūpā| soi rava madhura sunahu surabhūpā||
prabhu musukāna samujhi abhimānā| cāpa caṛhāi bāna saṃdhānā||
Meaning हे देवताओंके सम्राट ! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर [गर्जन] ध्वनि है। रावणका अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उसपर बाणका सन्धान किया;॥ ४॥
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।
सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ १३ ( क )॥
chatra mukuṭa tāṭaṃka taba hate ekahīṃ bāna|
sabakeṃ dekhata mahi pare maramu na koū jāna|| 13 ( ka )||
Meaning और एक ही बाणसे [रावणके] छत्र-मुकुट और [ मन्दोदरीके] कर्णफूल काट गिराये। सबके देखते-देखते वे जमीनपर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसीने नहीं जाना॥ १३ (क)॥
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।
रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥ १३ ( ख )॥
asa kautuka kari rāma sara prabiseu āi niṣaṃga|
rāvana sabhā sasaṃka saba dekhi mahā rasabhaṃga|| 13 ( kha )||
Meaning ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजीका बाण [वापस] आकर [फिर] तरकसमें जा घुसा। यह महान् रस-भंग (रंगमें भंग) देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो गयी॥ १३ (ख)॥
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा।
अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा॥
kaṃpa na bhūmi na maruta biseṣā| astra sastra kachu nayana na dekhā||
सोचहिं सब निज हृदय मझारी।
असगुन भयउ भयंकर भारी॥
socahiṃ saba nija hṛdaya majhārī| asaguna bhayau bhayaṃkara bhārī||
Meaning न भूकम्प हुआ, न बहुत जोरकी हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रोंसे देखे। [फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े ?] सभी अपने-अपने हृदयमें सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयड्र अपशकुन हुआ!॥ १॥
दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई॥
सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥
dasamukha dekhi sabhā bhaya pāī| bihasi bacana kaha juguti banāī||
sirau gire saṃtata subha jāhī| mukuṭa pare kasa asaguna tāhī||
Meaning सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे-सिरोंका गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना अपशकुन कैसा ?॥ २॥
सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई॥
मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ॥
sayana karahu nija nija gṛha jāī| gavane bhavana sakala sira nāī||
maṃdodarī soca ura baseū| jaba te śravanapūra mahi khaseū||
Meaning अपने-अपने घर जाकर सो रहो [डरनेकी कोई बात नहीं है] तब सब लोग सिर नवाकर घर गये। जबसे कर्णफूल पृथ्वीपर गिरा, तबसे मन्दोद्रीके हृदयमें सोच बस गया॥ ३॥
सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥
कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥
sajala nayana kaha juga kara jorī| sunahu prānapati binatī morī||
kaṃta rāma birodha pariharahū| jāni manuja jani haṭha mana dharahū||
Meaning नेत्रोंमें जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [ रावणसे।] कहने लगी--हे प्राणनाथ ! मेरी विनती सुनिये। हे प्रियतम ! श्रीरामसे विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मनमें हठ न पकड़े रहिये॥ ४॥
बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ १४॥
bisvarupa raghubaṃsa mani karahu bacana bisvāsu|
loka kalpanā beda kara aṃga aṃga prati jāsu|| 14||
Meaning मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुलके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं--(यह सारा विश्व उन्हींका रूप है) वेद जिनके अज्-अज़में लोकोंकी कल्पना करते हैं॥ १४॥