श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
श्री वैभव लक्ष्मी व्रत माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए शुक्रवार को किया जाता है। नीचे इस व्रत की पूजन सामग्री, व्रत विधि और व्रत कथा दी गई है।
पूजन सामग्री
रोली, मौली, धूप, अगरबत्ती, ऋतुफल, पान, पुष्प, पुष्पमाला, दूब, दही, शहद, घी, मेहंदी, सिंदूर, गुड़, बताशे, श्वेत वस्त्र, रक्त वस्त्र (लाल कपड़ा), हल्दी, चावल, पंचमेवा, लौंग, इलायची, श्रीफल, दीपक, रूई, माचिस, पंचपल्लव, सुपारी, समिधा (हवन हेतु लकड़ियां), हवन सामग्री, लोटा (पानी का बरतन), कटोरी, चम्मच।
वैभव लक्ष्मी पूजन मंत्र
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
पद्मासनस्थिते देवि वैभवलक्ष्मि स्वरूपिणि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
श्वेतांबरधरे देवि नाना अलंकार भूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
वैभव लक्ष्मी का ध्यान मंत्र
आसीना सरसीरुहे स्मितमुखी हस्ताम्बुजौर्विभृती,
दानं पद्म चुगाभये च वपुषा सौदामिनी सन्निभा॥
मुक्ताहार विराजन पृथुलोत्तुंगस्यनोद्भासिनी।
वायाद्रुः कमल कटाक्ष विभवैरानंदयंती हरिम्॥
व्रत विधि
माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन माता वैभव लक्ष्मी का व्रत किया जाता है। शुक्रवार के दिन माता संतोषी का व्रत भी किया जाता है। दोनों व्रत एक ही दिनवार में किये जाते हैं। परन्तु दोनों व्रतों को करने का विधि-विधान अलग-अलग है, और दोनों के व्रत का उद्देश्य भी भिन्न है। आइये माता वैभव लक्ष्मी के व्रत को करने की विधि जानें।
माता वैभव लक्ष्मी के व्रत की यह खूबी है कि इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों में से कोई भी कर सकता है। इस व्रत की एक और विशेषता है कि इस व्रत को करने से उपवासक को धन और सुख-समृद्धि दोनों की प्राप्ति होती है। घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह व्रत विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
अगर कोई व्यक्ति माता वैभव लक्ष्मी का व्रत करने के साथ-साथ लक्ष्मी श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रूप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि और धन में बढ़ोतरी होती है। व्यापारिक क्षेत्रों में दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि करने में माता वैभव लक्ष्मी व्रत और लक्ष्मी श्री यंत्र की पूजा विशेष लाभकारी रहती है। इस व्रत को करने का उद्देश्य दौलतमंद होना है। श्री लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रूप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है। पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है।
इस व्रत को करते समय शास्त्रों में कहे गये व्रत के सभी नियमों का पालन करना चाहिए, और व्रत का पालन भी पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए। व्रत करते समय ध्यान देने योग्य कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित हैं।
इस व्रत को यूं तो स्त्री और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। इसमें भी कन्याओं से अधिक सुहागिन स्त्रियों को इस व्रत के शुभ फल प्राप्त होने के विषय में कहा गया है। इस व्रत को प्रारम्भ करने के बाद नियमित रूप से 11 या 21 शुक्रवारों तक करना चाहिए।
व्रत का प्रारम्भ करते समय व्रतों की संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए, और संख्या पूरी होने पर व्रत का उद्यापन अवश्य करना चाहिए। उद्यापन न करने पर व्रत का फल समाप्त होता है।
व्रत के दिन माता लक्ष्मी जी की पूजा-उपासना करने के साथ-साथ पूरे दिन माता का ध्यान और स्मरण करना चाहिए। व्रत के दिन की अवधि में दिन के समय में सोना नहीं चाहिए, और न ही अपने दैनिक कार्य छोड़ने चाहिए। आलसी भाव को स्वयं से दूर रखना चाहिए। आलसी व्यक्तियों के पास लक्ष्मी जी कभी नहीं आती है।
साथ ही प्रातः जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए। जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर-स्थान में देवी लक्ष्मी निवास नहीं करती है।
लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा और पूजा में रखने के लिए धन के रूप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए। नोटों का प्रयोग करना शुभ नहीं माना जाता है।
व्रत को शुरू करने से पहले प्रातःकाल में शीघ्र उठकर, नित्यक्रियाओं से निवृत्त होकर, पूरे घर की सफाई कर, घर को गंगा जल से शुद्ध करना चाहिए। और उसके बाद ईशान कोण की दिशा में माता लक्ष्मी की चांदी की प्रतिमा या तस्वीर लगानी चाहिए। साथ ही श्री यंत्र भी स्थापित करना चाहिए। श्री यंत्र को सामने रखकर उसे प्रणाम करना चाहिए, और अष्टलक्ष्मियों का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम करना चाहिए। अष्टलक्ष्मी नाम इस प्रकार हैं — श्री धनलक्ष्मी व वैभव लक्ष्मी, गजलक्ष्मी, अधिलक्ष्मी, विजयालक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी आदि। इसके पश्चात् मंत्र बोलना चाहिए।
मंत्र
या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती॥
जो उपवासक मंत्र बोलने में असमर्थ हों, वे इसका अर्थ बोल सकते हैं।
उपरोक्त मंत्र का अर्थ
जो लाल कमल में रहती है, जो अपूर्व कांतिवाली है, जो असह्य तेजवाली है, जो पूर्ण रूप से लाल है, जिसने रक्तरूप वस्त्र पहने हैं, जो भगवान विष्णु को अति प्रिय है, जो लक्ष्मी मन को आनंद देती है, जो समुद्रमंथन से प्रकट हुई है, जो विष्णु भगवान की पत्नी है, जो कमल से जन्मी है और जो अतिशय पूज्य है, वैसी हे लक्ष्मी देवी! आप मेरी रक्षा करें।
इसके बाद पूरे दिन व्रत कर दोपहर के समय चाहें, तो फलाहार करना चाहिए और रात्रि में एक बार भोजन करना चाहिए। सायंकाल में सूर्यास्त होने के बाद प्रदोषकाल समय स्थिर लग्न समय में माता लक्ष्मी का व्रत समाप्त करना चाहिए।
पूजा करने के बाद माता वैभव लक्ष्मी जी की व्रत कथा का श्रवण करना चाहिए। व्रत के दिन खीर से माता को भोग लगाना चाहिए, और धूप, दीप, गंध और श्वेत फूलों से माता की पूजा करनी चाहिए। सभी को खीर का प्रसाद बांटकर स्वयं खीर जरूर ग्रहण करनी चाहिए।
श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
एक समय की बात है कि एक शहर में एक शीला नाम की स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। शीला स्वभाव से धार्मिक प्रवृत्ति की थी। और भगवान की कृपा से उसे जो भी प्राप्त हुआ था, वह उसी में संतोष करती थी। शहरी जीवन वह जरूर व्यतीत कर रही थी, परन्तु शहर के जीवन का रंग उस पर नहीं चढ़ा था। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव और परोपकार का भाव उसमें अभी भी था।
वह अपने पति और अपनी गृहस्थी में प्रसन्न थी। आस-पड़ोस के लोग भी उसकी सराहना किया करते थे। देखते ही देखते समय बदला और उसका पति कुसंगति का शिकार हो गया। वह शीघ्र अमीर होने का ख्वाब देखने लगा। अधिक से अधिक धन प्राप्त करने के लालच में वह गलत मार्ग पर चल पड़ा। जीवन में रास्ते से भटकने के कारण उसकी स्थिति भिखारी जैसी हो गई। बुरे मित्रों के साथ रहने के कारण उसमें शराब, जुआ, रेस और नशीले पदार्थों का सेवन करने की आदत उसे पड़ गई। इन गंदी आदतों में उसने अपना सब धन गंवा दिया।
अपने घर और अपने पति की यह स्थिति देखकर शीला बहुत दुःखी रहने लगी। परन्तु वह भगवान पर आस्था रखने वाली स्त्री थी। उसे अपने देव पर पूरा विश्वास था। एक दिन दोपहर के समय उसके घर के दरवाजे पर किसी ने आवाज दी। दरवाजा खोलने पर सामने पड़ोस की माता जी खड़ी थी। माता के चेहरे पर एक विशेष तेज था। वह करुणा और स्नेह की देवी नजर आ रही थी। शीला उस माँजी को घर के अन्दर ले आई। घर में बैठने के लिए कुछ खास व्यवस्था नहीं थी। शीला ने एक फटी हुई चादर पर उसे बिठाया। माँजी बोलीं – क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहाँ आती हूँ। इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी, फिर माँजी बोलीं – ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।’
माँजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। माँजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने माँजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई। कहानी सुनकर माँजी ने कहा – माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ शीला के पूछने पर माँजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। माँजी ने कहा – ‘बेटी! माँ लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।’
शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि माँजी कहाँ गई? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि माँजी और कोई नहीं साक्षात् लक्ष्मीजी ही थीं।
दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने माँजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि करके सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं – ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को प्रणाम किया।
व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा, पृष्ठ 154–159
पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।