दीपावली लक्ष्मी पूजन व्रत कथा
दीपावली के पर्व पर धनतेरस से लेकर लक्ष्मी पूजन तक कही जाने वाली पारम्परिक कथाएँ नीचे दी गई हैं — धनतेरस की कथा, श्री लक्ष्मी जी की कहानी और राजा बलि की कथा।
धनतेरस कथा
एक बार यमराज ने अपने दूतों से प्रश्न किया — क्या प्राणियों के प्राण हरते समय तुम्हें किसी पर दया भी आती है? यमदूत संकोच में पड़कर बोले — नहीं महाराज! हम तो आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। हमें दया-भाव से क्या प्रयोजन? यमराज ने सोचा कि शायद ये संकोचवश ऐसा कह रहे हैं। अतः उन्हें निर्भय करते हुए वे बोले — संकोच मत करो। यदि कभी कहीं तुम्हारा मन पसीजा हो तो निडर होकर कहो। तब यमदूतों ने डरते-डरते बताया — सचमुच! एक ऐसी ही घटना घटी थी महाराज, जब हमारा हृदय काँप उठा था। ऐसी क्या घटना घटी थी? — उत्सुकतावश यमराज ने पूछा।
महाराज! हंस नाम का राजा एक दिन शिकार के लिए गया। वह जंगल में अपने साथियों से बिछड़ कर भटक गया और दूसरे राज्य की सीमा में चला गया। वहाँ के शासक हेमा ने राजा हंस का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया था। ज्योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके बताया कि यह बालक विवाह के चार दिन बाद मर जाएगा। राजा हेमा के आदेश से उस बालक को यमुना के तट पर एक गुहा में ब्रह्मचारी के रूप में रखा गया। उस तक स्त्रियों की छाया भी न पहुँचने दी गई। किन्तु विधि का विधान तो अडिग होता है। समय बीतता रहा। संयोग से एक दिन राजा हंस की युवा बेटी यमुना के तट पर निकल गई और उसने उस ब्रह्मचारी बालक से गंधर्व विवाह कर लिया।
चौथा दिन आया और राजकुँवर मृत्यु को प्राप्त हुआ। उस नवपरिणीता का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय काँप गया। ऐसी सुंदर जोड़ी हमने कभी नहीं देखी थी। वे कामदेव तथा रति से भी कम नहीं थे। उस युवक को काल ग्रस्त करते समय हमारे भी अश्रु नहीं थम पाए थे।
यमराज ने द्रवित होकर कहा — क्या किया जाए? विधि के विधान की मर्यादा हेतु हमें ऐसा अप्रिय कार्य करना पड़ा। महाराज! — एकाएक एक दूत ने पूछा — क्या अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है? यमराज ने अकाल मृत्यु से बचने का उपाय बताते हुए कहा — धनतेरस के पूजन एवं दीपदान को विधिपूर्वक करने से अकाल मृत्यु से छुटकारा मिलता है। जिस घर में यह पूजन होता है, वहाँ अकाल मृत्यु का भय पास भी नहीं फटकता।
इसी घटना से धनतेरस के दिन धन्वन्तरि पूजन सहित दीपदान की प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ।
श्री लक्ष्मी जी की कहानी
प्राचीन समय में एक नगर में एक साहूकार था। उसकी एक लड़की थी, वह नित्य पीपल देवता की पूजा करती थी। उसने देखा कि श्री महालक्ष्मी जी उसी पीपल से निकला करती हैं। एक दिन लक्ष्मी जी उस साहूकार की लड़की से बोली कि मैं तुझ पर बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए तू मेरी सहेली बनना स्वीकार कर ले। लड़की बोली — क्षमा कीजिए, मैं अपने माता-पिता से पूछकर बताऊँगी। इसके बाद वह अपने माता-पिता की आज्ञा प्राप्त कर श्री लक्ष्मी जी की सहेली बन गई। श्री महालक्ष्मी उससे बड़ा प्रेम करती थीं।
एक दिन महालक्ष्मी जी ने उस लड़की को भोजन जीमने को निमंत्रण दिया। जब लड़की भोजन पाने को गई तो लक्ष्मी जी ने उसे सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खिलाया और सोने की चौकी पर उसे बैठाया और बहुमूल्य दिव्य दुशाला उसे ओढ़ने को दिया। तत्पश्चात् लक्ष्मी जी ने कहा कि मैं भी कल यहाँ जीमने को आऊँगी। लड़की ने स्वीकार कर लिया और अपने माता-पिता से सब हाल कहकर सुनाया तो सुनकर उसके माता-पिता बहुत प्रसन्न हुए। परन्तु लड़की उदास होकर बैठ गई। कारण पूछने पर उसने अपने पिता को बताया कि लक्ष्मी जी का वैभव बहुत बड़ा है, मैं उन्हें कैसे सन्तुष्ट कर सकूँगी।
उसके पिता ने कहा कि बेटी, गोबर से पृथ्वी को लीपकर जैसा भी बन पाये उन्हें रूखा-सूखा श्रद्धा और प्रेम से खिला देना। यह बात पिता कहने भी न पाया कि सहसा एक चील मंडराती हुई आई और किसी रानी का नौलखा हार वहीं डाल गई। यह देखकर साहूकार की लड़की बहुत प्रसन्न हो गई। उसने हार को थाल में रख करके बहुत बढ़िया दुशाले से ढककर रख दिया। तब तक श्री गणेश और महालक्ष्मी जी भी वहाँ आ गए। लड़की ने उन्हें सोने की चौकी पर बैठने को कहा, इस पर श्री महालक्ष्मी जी ने कहा कि इस पर तो राजा-रानी बैठते हैं, हम कैसे बैठें। बहुत आग्रह करने पर महालक्ष्मी जी और गणेश जी ने बड़े प्रेम से भोजन किया। लक्ष्मी जी के और गणेश जी के पदार्पण करते ही साहूकार का घर सुख-सम्पत्तियों से भर गया।
हे महालक्ष्मी जी! जिस प्रकार साहूकार का घर धन-सम्पत्ति से भर गया था, उसी प्रकार सभी के घरों में धन-सम्पत्ति भरकर सभी को कृतार्थ कर दो।
राजा बलि की कथा
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्री कृष्ण से विनयपूर्वक पूछा कि, हे भगवन्! आप मुझे कृपा कर कोई ऐसा व्रत या अनुष्ठान बतायें, जिसके करने से मैं अपने नष्ट राज्य को पुनः प्राप्त कर सकूँ, क्योंकि राज्यच्युत हो जाने के कारण मैं अत्यन्त दुःखी हूँ।
श्री कृष्ण जी ने कहा — हे राजन्! मेरे परमभक्त दैत्यराज बलि ने एक बार सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया। निन्यानबे यज्ञ तो उसने निर्विघ्न रूप से पूर्ण कर लिये, परन्तु सौवाँ यज्ञ के पूर्ण होते ही उन्हें अपने राज्य से निर्वासित होने का भय सताने लगा।
देवताओं को साथ लेकर इन्द्र क्षीरसागर निवासी भगवान् विष्णु के पास पहुँचकर वेद-मन्त्रों से स्तुति की और अपने कष्ट का सम्पूर्ण वृत्तान्त भगवान् विष्णु से कह सुनाया। सुनकर भगवान् ने उनसे कहा — तुम निर्भय होकर अपने लोक में जाओ। मैं तुम्हारे कष्ट को शीघ्र दूर करूँगा।
इन्द्र के चले जाने पर भगवान् ने वामन का अवतार धारण कर बटुवेश में राजा बलि के यज्ञ में प्रस्थान किया। राजा बलि को वचनबद्ध कर भगवान् ने तीन पग भूमि उनसे दान में माँग ली। बलि द्वारा दान का संकल्प करते ही भगवान् ने अपने विराट् रूप से एक पग में सारी पृथ्वी को नाप लिया। दूसरे पग से अंतरिक्ष और तीसरा चरण उसके सिर पर रख दिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रसन्न हो भगवान् ने उससे वर माँगने को कहा। राजा ने कहा — कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से अमावस्या तक अर्थात् दीपावली तक इस धरती पर मेरा राज्य रहे। इन तीन दिनों तक सभी लोग दीप-दान कर लक्ष्मी जी की पूजा करें और कर्ता के गृह में लक्ष्मी का वास हो।
राजा द्वारा याचित वर को देकर भगवान् ने बलि को पातालपुरी का राज्य देकर पाताल लोक को भेज दिया। उसी समय से देश के सम्पूर्ण नागरिक इस पुनीत दीपावली पर्व को मनाते चले आ रहे हैं। अतः सभी प्राणियों के लिये इस पर्व को सद्भावनापूर्वक मनाना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — दीपावली लक्ष्मी पूजन व्रत कथा, पृष्ठ 24–27
पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।