कजली तीज व्रत कथा
कजली तीज (सातूड़ी तीज) भादों मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाने वाली स्त्रियों की तीज है, जो विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित है। नीचे इसका महत्व एवं पारम्परिक व्रत कथा दी गई है।
कजली (सातूड़ी) तीज
श्रावण मास की तीज को हरियाली तीज का त्यौहार मनाया जाता है। उसी प्रकार से भादों मास के कृष्ण पक्ष की तीज को कजरी तीज का त्यौहार मनाया जाता है। इसे ‘बूढ़ी तीज’ भी कहा जाता है। इस दिन महेश्वरी वैश्य गेहूं, जौ, चने और चावल के सत्तू में घी, मेवा डालकर विभिन्न प्रकार के पकवान बनाते हैं तथा चन्द्रोदय के बाद उसी का भोजन करते हैं। इसलिए इसे ‘सातूड़ी तीज’ अथवा ‘सतवा तीज’ भी कहा जाता है।
इस दिन विशेषतौर पर गाय की पूजा की जाती है। आटे की सात लोइयां बनाकर उन पर घी, गुड़ रखकर गाय को खिलाने के बाद ही भोजन किया जाता है। कुछ लोग इस दिन हरियाली तीज की तरह सिंजारे भेजते हैं। इस दिन बहुएं अपनी सास को चीनी और रुपये का भायना निकालकर देती हैं।
यह त्यौहार खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में मनाया जाता है। कजरी की प्रतिद्वंद्विता भी होती है। नावों पर चढ़कर लोग कजरी गीत गाते हैं। ब्रज के मल्हारों की ही तरह मिर्जापुर तथा बनारस का यह प्रमुख वर्षागीत माना जाता है। इस दिन घरों में मिठाई तथा पकवान बनाए जाते हैं। झूले भी डाले जाते हैं। ग्रामीण भाषा में इसे ‘तीजा’ कहा जाता है।
कजली तीज कथा
एक साहूकार के चार बेटे और बहुएं थीं। तीनों बड़ी बहुएं भरे पूरे परिवार से थीं। परन्तु छोटी बहू के मायके में कोई नहीं था। बड़ी तीज पर तीनों बहुओं के घर से सत्तू आया, लेकिन छोटी बहू का मन इस विचार से दुखी हो गया कि उसके लिए सत्तू कहाँ से आएगा। उसने अपने पति से कहा कि — “मेरे लिए भी सत्तू लेकर आना, चाहे कुछ भी करना पड़े।”
उसके पति ने उसके लिए सत्तू लाने का पूरा प्रयास किया परन्तु सफलता नहीं मिली। जब वह शाम को घर लौटा और अपनी पत्नी का उदास चेहरा देखा तो वह रात भर सो ना सका। दूसरे दिन तीज थी। वह रात को अंधेरे में ही घर से निकल गया और एक बनिये की दुकान में घुस गया। वहां चने की दाल लेकर चक्की में पीसना शुरू कर दिया। चक्की की आवाज सुनकर बनिये के घरवाले जाग गए। उन्होंने उसे पकड़कर पूछा — “यहां क्या कर रहे हो।”
इस पर उसने जवाब दिया कि — “कल सातूड़ी तीज है और मेरी पत्नी के पीहर में कोई नहीं है, अतः उसके लिए सत्तू चोरी करने आया हूं। आपकी दुकान में दाल, चीनी और घी सभी था, इसलिए आपके यहां से सत्तू बनाकर ले जा रहा था।”
यह सुनकर बनिया बोला — “तुम अपने घर जाओ। आज से तुम्हारी पत्नी हमारी धर्म बेटी हुई।”
वह घर लौट आया। दूसरे दिन सवेरे ही बनिये ने नौकरों के साथ चार तरह के सत्तू के पिंडे, साड़ी और अन्य पूजा का सामान उसके घर भिजवा दिया।
जेठानियां यह सब देखकर कहने लगीं कि — “तुम्हारे पीहर में तो कोई नहीं है, फिर यह सब कहां से आया।”
तब देवरानी ने उन्हें सारी बात बताकर कहा कि यह सब मेरे धर्म पिता ने भेजा है।
स्रोत 1
- Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — कजली तीज व्रत कथा, पृष्ठ 253–254
पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।