श्रीत्रिपुरसुन्दरीकवचम्
माहात्म्य 4
विनियोग 1
त्रिकूट बीज 2
त्रिकूट कवच 3
भैरवी-न्यास 5
दिग्-अङ्ग रक्षा 9
शक्ति-रक्षा 6
बीजाक्षर रक्षा 2
विद्या-स्तुति 4
फलश्रुति 7
समापन 1
परिचय
कालिकापुराण के पचहत्तरवें अध्याय में शिव द्वारा वेतालभैरव को कहा गया यह त्रिपुराकवच देवी त्रिपुरसुन्दरी (षोडशी, ललिता, राजराजेश्वरी) की श्रीविद्या का रक्षाकवच है। इसमें वाग्भव, कामराज एवं त्रैलोक्यमोहन — इन तीन कूट-बीजों से मस्तक, हृदय एवं इन्द्रियों की, तथा त्रिपुरभैरवी के अनेक रूपों (सुभगा, भगमालिनी, अनङ्गकुसुमा, मातङ्गी आदि) से दसों दिशाओं एवं समस्त अंगों की रक्षा का आवाहन है।
यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।
स्रोत 2
- Sanskrit Documents — शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम् — tripurAkavachamshivaproktaM, Kalika Purana ch. 75, proofread by PSA Easwaran
संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं, अर्थ व्याख्यात्मक। धार्मिक समीक्षा अपेक्षित।
- Manblunder — Sri Bala Tripura Sundari Kavacham (Shri Vidya bija meanings) — functional gloss of the three kutas — vagbhava (speech/knowledge), kamaraja (desire), shakti/trailokyamohana; directional and anga nyasa
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