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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

श्रीप्रत्यङ्गिराकवचम्

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प्रदर्शन

प्रस्तावना 5

विनियोग 1

अङ्गन्यास 5

दिग्बन्ध 5

फलश्रुति 7

समापन 1

परिचय

रुद्रयामल तन्त्र के पञ्चाङ्ग खण्ड में वर्णित यह तन्त्रोक्त श्रीप्रत्यङ्गिरा सर्वार्थसाधक कवच अथर्वणभद्रकाली (प्रत्यङ्गिरा) की उपासना का अत्यन्त गोपनीय रक्षाकवच है। शिव-भैरव एवं देवी के संवाद के रूप में इसमें ऐं, ह्रीं, श्रीं आदि बीजों तथा प्रत्यङ्गिरा, कामेश्वरी, लक्ष्मी, गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी, वाराही आदि शक्तियों को अंग-प्रत्यंग की, और इन्द्रादि दिक्पालों को दसों दिशाओं की रक्षा हेतु आवाहित किया गया है।

यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।

स्रोत 2

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।