श्रीपञ्चमुखहनुमत्कवचम्
मङ्गलाचरण 1
विनियोग 1
ध्यानम् 12
पञ्चमुख मन्त्र 1
न्यास 3
ध्यान एवं मूल मन्त्र 2
दिग्बन्ध (बीजमन्त्र) 2
फलश्रुति 7
समापन 1
परिचय
श्रीपञ्चमुखहनुमत्कवच भगवान् हनुमान् के पञ्चमुख (पाँच मुख वाले) स्वरूप की आराधना का अत्यन्त शक्तिशाली रक्षा-कवच है। इसमें हनुमान् जी के पूर्व (वानर), दक्षिण (नरसिंह), पश्चिम (गरुड), उत्तर (वराह) तथा ऊर्ध्व (हयग्रीव) — इन पाँच मुखों का ध्यान कर भक्त अपने अंग-प्रत्यंग की रक्षा का वरण करता है। यह पाठ सुदर्शनसंहिता में श्रीरामचन्द्र एवं सीता द्वारा कथित माना जाता है और शत्रु-बाधा, भय, रोग एवं नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हेतु श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है।
संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से मिलान कर प्रस्तुत है; अर्थ व्याख्यात्मक हैं। शुद्ध उच्चारण एवं विधि हेतु योग्य आचार्य का मार्गदर्शन श्रेयस्कर है।
स्रोत 1
- Sanskrit Documents — पञ्चमुखहनुमत्कवचम् (सुदर्शनसंहिता) — panchamukhahanumatkavacham, ITRANS प्रामाणिक पाठ (Traditional)
संस्कृत मूल पाठ इसी प्रामाणिक, प्रूफरीड डिजिटल स्रोत से अक्षरशः लिया गया है (सुदर्शनसंहितान्तर्गत श्रीरामचन्द्र-सीताप्रोक्त पाठ)। बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं; अर्थ व्याख्यात्मक हैं। पूर्वपीठिका का श्रीपार्वती-श्रीशिव संवाद (अधिकार-विचार) प्रचलित पाठ-परम्परा अनुसार यहाँ नहीं दिया गया — कवच का मुख्य पाठ (विनियोग से फलश्रुति तक) प्रस्तुत है। धार्मिक समीक्षा में मुद्रित संस्करण से पुनः मिलान अपेक्षित।
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।