श्रीकामाख्याकवचम्
विनियोग 1
अङ्गन्यास 7
बीजन्यास 3
दिग्रक्षा 5
स्तुति 1
ध्यान 2
फलश्रुति 5
समापन 1
परिचय
कालिकापुराण के बहत्तरवें अध्याय में भगवान् हरि (नारायण) द्वारा कहा गया यह हरिप्रोक्त कामाख्याकवच कामरूप-पीठ की अधिष्ठात्री देवी कामाख्या (कामेश्वरी) की उपासना का रक्षाकवच है। इसमें कामेश्वरी, कामाख्या, शारदा, त्रिपुरा, महामाया, कोटेश्वरी, भैरवी, मातङ्गी, ललिता, विन्ध्यवासिनी, भुवनेश्वरी आदि देवी-रूपों द्वारा मस्तक से चरण तक समस्त अंगों की, तथा वैष्णवी-मन्त्र के आठ वर्णों एवं सेतु-बीजों द्वारा दसों दिशाओं की रक्षा का आवाहन है।
यहाँ संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः दिया गया है; अर्थ व्याख्यात्मक है। बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं। धार्मिक-विद्वत् समीक्षा अपेक्षित।
स्रोत 2
- Sanskrit Documents — हरिप्रोक्तं कामाख्याकवचम् — kAmAkhyAkavachamhariproktaM, Kalika Purana ch. 72, proofread by PSA Easwaran
संस्कृत मूल पाठ प्रामाणिक स्रोत से अक्षरशः; बीजमन्त्रों का शब्दशः अनुवाद सम्भव नहीं, अर्थ व्याख्यात्मक। धार्मिक समीक्षा अपेक्षित।
- GuruKripa — कामाख्या कवच (विधि व अर्थ सहित) — anga-nyasa deity-to-body mapping and explanatory meaning
अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।