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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

सप्तवार व्रत कथा

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सप्ताह के सातों वार अलग-अलग देवताओं को समर्पित हैं और प्रत्येक वार का अपना व्रत, पूजा विधि और कथा है। नीचे सोमवार से रविवार तक सातों वार के व्रतों की पारम्परिक विधि और व्रत कथाएँ दी गई हैं।

सोमवार व्रत कथा

पूजा विधि

सोमवार का व्रत साधारणतया दिन के तीसरे पहर तक होता है। व्रत में फलाहार या पारायण का कोई खास नियम नहीं है किन्तु यह आवश्यक है कि दिन रात में केवल एक समय भोजन करें। सोमवार के व्रत में शिवजी पार्वती का पूजन करना चाहिए। सोमवार के व्रत तीन प्रकार के हैं साधारण प्रति सोमवार, सौम्य प्रदोष और सोलह सोमवार, विधि तीनों की एक जैसी है। शिव पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए।

व्रत कथा

एक बहुत धनवान साहूकार था, जिसके घर धन आदि किसी प्रकार की कमी नहीं थी। परन्तु उसको एक दुःख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था। वह इसी चिन्ता में रात-दिन रहता था और वह पुत्र की कामना के लिए प्रति सोमवार को शिवजी का व्रत और पूजन किया करता था तथा सायंकाल को शिव मन्दिर में जाकर के शिवजी के श्री विग्रह के सामने दीपक जलाया करता था।

उसके इस भक्तिभाव को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शिवजी महाराज से कहा कि महाराज, यह साहूकार आपका अनन्य भक्त है और सदैव आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा से करता है। इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए।

शिवजी ने कहा- हे पार्वती! यह संसार कर्मक्षेत्र है। जैसे किसान खेत में जैसा बीज बोता है वैसा ही फल काटता है। उसी तरह इस संसार में जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं। पार्वती जी ने अत्यन्त आग्रह से कहा- महाराज! जब यह आपका अनन्य भक्त है और इसको अगर किसी प्रकार का दुःख है तो उसको अवश्य दूर करना चाहिए, क्योंकि आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु होते हैं और उनके दुःखों को दूर करते हैं। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो मनुष्य आपकी सेवा तथा व्रत क्यों करेंगे।

पार्वती जी का ऐसा आग्रह देख शिवजी महाराज कहने लगे- हे पार्वती! इसके कोई पुत्र नहीं है इसी चिन्ता में यह अति दुःखी रहता है। इसके भाग्य में पुत्र न होने पर भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूँ। परन्तु यह पुत्र केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा। इसके पश्चात् वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इससे अधिक मैं और कुछ इसके लिए नहीं कर सकता।

यह सब बातें साहूकार सुन रहा था। इससे उसको न कुछ प्रसन्नता हुई और न ही कुछ दुःख हुआ। वह पहले जैसा ही शिवजी महाराज का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीने उसके गर्भ से अति सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुई। साहूकार के घर में बहुत खुशी मनाई गई परन्तु साहूकार ने उसकी केवल बारह वर्ष की आयु जान कोई अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं की और न ही किसी को भेद ही बताया।

जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हो गया तो उस बालक की माता ने उसके पिता से विवाह आदि के लिए कहा तो वह साहूकार कहने लगा कि अभी मैं उसका विवाह नहीं करूँगा। अपने पुत्र को काशी जी पढ़ने के लिए भेजूँगा। फिर साहूकार ने अपने साले अर्थात् बालक के मामा को बुला उसको बहुत सा धन देकर कहा तुम बालक को काशी जी पढ़ने के लिये ले जाओ और रास्ते में जिस स्थान पर भी जाओ यज्ञ करते हुए ब्राह्मणों को भोजन कराते जाओ।

वह दोनों मामा-भानजे यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे। रास्ते में उनको एक शहर पड़ा। उस शहर में राजा की कन्या का विवाह था और दूसरे राजा का लड़का जो विवाह कराने के लिए बारात लेकर आया था, वह एक आँख से काना था। उसके पिता को इस बात की बड़ी चिन्ता थी कि कहीं वर को देख कन्या के माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अड़चन पैदा न कर दें। इस कारण जब उसने अति सुन्दर सेठ के लड़के को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों न दरवाजे के समय इस लड़के से वर का काम चलाया जाये। ऐसा विचार कर वर के पिता ने उस लड़के और मामा से बात की तो वे राजी हो गये। फिर उस लड़के को वर के कपड़े पहना तथा घोड़ी पर चढ़ा दरवाजे पर ले गये और सब कार्य प्रसन्नता से पूर्ण हो गया। फिर वर के माता पिता ने सोचा कि यदि विवाह कार्य भी इसी लड़के से करा लिया जाय तो क्या बुराई है? ऐसा विचार कर लड़के और उसके मामा से कहा-यदि आप फेरों का और कन्यादान के काम को भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी और मैं इसके बदले में आपको बहुत कुछ धन दूँगा तो उन्होंने स्वीकार कर लिया और विवाह कार्य भी बहुत अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया।

परन्तु जिस समय लड़का जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुन्दड़ी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है, परन्तु जिस राजकुमार के साथ भेजेंगे वह एक आँख से काना है और मैं काशी जी पढ़ने जा रहा हूँ। लड़के के जाने के पश्चात् उस राजकुमारी ने जब अपनी चुन्दड़ी पर ऐसा लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और कहा कि यह मेरा पति नहीं है। मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है। वह तो काशी जी पढ़ने गया है। राजकुमारी के माता-पिता ने अपनी कन्या को विदा नहीं किया और बारात वापस चली गयी।

उधर सेठ का लड़का और उसका मामा काशी जी में पहुँच गये। वहाँ जाकर उन्होंने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू कर दिया। जब लड़के की आयु बारह साल की हो गई उस दिन उन्होंने यज्ञ रचा रखा था कि लड़के ने अपने मामा से कहा- मामाजी आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा- अन्दर जाकर सो जाओ। लड़का अन्दर जाकर सो गया और थोड़ी देर में उसके प्राण निकल गए। जब उसके मामा ने आकर देखा तो वह मुर्दा पड़ा है तो उसको बड़ा दुःख हुआ और उसने सोचा कि अगर मैं अभी रोना-पीटना मचा दूँगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा। अतः उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य समाप्त कर ब्राह्मणों के जाने के बाद रोना-पीटना आरम्भ कर दिया।

संयोगवश उसी समय शिव-पार्वती जी उधर से जा रहे थे। जब उन्होंने जोर-जोर से रोने की आवाज सुनी तो पार्वती जी कहने लगीं- महाराज! कोई दुखिया रो रहा है इसके कष्ट को दूर कीजिये। जब शिव-पार्वती ने पास जाकर देखा तो वहाँ एक लड़का मुर्दा पड़ा था। पार्वती जी कहने लगीं- महाराज यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आपके वरदान से हुआ था। शिवजी कहने लगे- हे पार्वती! इसकी आयु इतनी थी सो यह भोग चुका। तब पार्वती जी ने कहा- हे महाराज! इस बालक को और आयु दो नहीं तो इसके माता-पिता तड़प-तड़प कर मर जायेंगे।

पार्वती जी के बार-बार आग्रह करने पर शिवजी ने उसको जीवन वरदान दिया और शिवजी महाराज की कृपा से लड़का जीवित हो गया। शिव-पार्वती कैलाश पर्वत चले गये।

तब वह लड़का और मामा उसी प्रकार यज्ञ करते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते अपने घर की ओर चल पड़े। रास्ते में उसी शहर में आए जहाँ उसका विवाह हुआ था। वहाँ पर आकर उन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया तो उस लड़के के ससुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में ले जाकर उसकी बड़ी खातिर की, साथ ही बहुत दास-दासियों सहित आदर पूर्वक लड़की और जमाई को विदा किया। जब वह अपने शहर के निकट आए तो मामा ने कहा कि मैं पहले तुम्हारे घर जाकर खबर कर लेता हूँ। जब उस लड़के का मामा घर पहुँचा तो लड़के के माता-पिता घर की छत पर बैठे थे और यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा पुत्र सकुशल लौट आया तो हम राजी-खुशी नीचे आ जायेंगे नहीं तो छत से गिरकर अपने प्राण खो देंगे।

इतने में उस लड़के के मामा ने आकर यह समाचार दिया कि आपका पुत्र आ गया है तो उनको विश्वास नहीं आया तब उसके मामा ने शपथपूर्वक कहा कि आपका पुत्र अपनी स्त्री के साथ बहुत सारा धन साथ लेकर आया है तो सेठ ने आनन्द के साथ उसका स्वागत किया और बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। इसी प्रकार से जो कोई भी सोमवार के व्रत को धारण करता है अथवा इस कथा को पढ़ता या सुनाता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

मंगलवार व्रत कथा

पूजा विधि

सर्व सुख, रक्त विकार, राज्य सम्मान तथा पुत्र की प्राप्ति के लिये मंगलवार का व्रत उत्तम है। इस व्रत में गेहूँ और गुड़ का भोजन करना चाहिए। भोजन दिन रात में एक बार ही ग्रहण करना ठीक है। व्रत इक्कीस सप्ताह तक करें। मंगलवार के व्रत से मनुष्य के समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं। व्रत के पूजन के समय लाल पुष्पों को चढ़ावे और लाल वस्त्र धारण करें। अन्त में हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए तथा मंगलवार की कथा सुननी चाहिए।

व्रत कथा

एक ब्राह्मण दम्पति के कोई सन्तान नहीं थी, जिसके कारण पति-पत्नि दुःखी थे। वह ब्राह्मण हनुमान जी की पूजा हेतु वन चला गया। वह पूजा के साथ महावीर जी से एक पुत्र की प्राप्ति के लिए कामना करने प्रकट किया करता था। घर पर उसकी पत्नि मंगलवार व्रत पुत्र प्राप्ति के लिए किया करती थी। मंगल के दिन व्रत के अन्त भोजन ग्रहण करती थी। मंगल के दिन व्रत के अंत भोजन बनाकर हनुमान जी को भोग लगाने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करती थी।

एक बार कोई व्रत आ गया। जिसके कारण ब्राह्मणी भोजन न बना सकी तब हनुमान जी का भोग भी नहीं लगाया। वह अपने मन में ऐसा प्रण करके सो गई कि अब अगले मंगलवार के दिन तो उसे मूर्छा आ गई तब हनुमान जी उसकी लगन और निष्ठा को देखकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे दर्शन दिया और कहा- मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ। मैं तुझको एक सुन्दर बालक देता हूँ। जो तेरी सेवा किया करेगा। हनुमान जी बाल रूप में उसको दर्शन देकर अंतर्धान हो गए।

सुन्दर बालक पाकर ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुई। ब्राह्मणी ने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय पश्चात् ब्राह्मण वन से लौटकर आया। प्रसन्नचित्त सुन्दर बालक को घर में क्रीड़ा करते देखकर पत्नी से बोला- यह बालक कौन है? पत्नी ने कहा- मंगलवार के व्रत से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने दर्शन देकर मुझे बालक दिया है। पत्नी की बात छल से भरी जान उसने सोचा यह कुलटा व्यभिचारिणी अपनी कुलघटता छुपाने के लिए बात बना रही है।

एक दिन उसका पति कुएँ पर पानी भरने चला तो पत्नी ने कहा मंगल को साथ ले जाओ। वह मंगल को साथ ले चला और उसको कुएँ में डालकर वापिस पानी भरकर घर आया तो पत्नी ने पूछा मंगल कहाँ है? तभी मंगल मुस्कराता हुआ घर आ गया। उसको देख ब्राह्मण आश्चर्यचकित हुआ। रात्रि को हनुमान जी ने उसको स्वप्न में कहा- यह बालक मैंने दिया है तुम पत्नी को कुलटा क्यों कहते हो। पति यह जानकर हर्षित हुआ। फिर पति-पत्नि मंगल का व्रत रख अपना जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत करने लगे। जो मनुष्य मंगलवार के व्रत को नियम से करता है अथवा इस कथा को पढ़ता और सुनता है, उसके हनुमान जी की कृपा से सब कष्ट दूर होकर सर्व सुख प्राप्त होता है।

बुधवार व्रत कथा

पूजा विधि

ग्रह शान्ति तथा सर्व-सुखों की इच्छा रखने वालों को बुधवार का व्रत करना चाहिए। इस व्रत में रात दिन में एक बार भोजन ही करना चाहिए। इस व्रत के समय हरी वस्तुओं का उपयोग करना श्रेष्ठ है। इस व्रत के अंत में शंकर जी की पूजा धूप, बेल-पत्र आदि से करनी चाहिए। साथ ही कथा सुनकर आरती के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिए। बीच में नहीं जाना चाहिए।

व्रत कथा

एक समय एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विदा करवाने अपनी ससुराल गया। वहाँ पर कुछ दिन रहने के बाद सास-ससुर से विदा करने के लिए कहा। किन्तु सब ने कहा कि आज बुधवार है आज के दिन गमन नहीं करते हैं। वह व्यक्ति किसी प्रकार न माना और हठधर्मी करके बुधवार के दिन ही पत्नी को विदा कराकर अपने नगर को चल पड़ा।

रास्ते में उसकी पत्नी को प्यास लगी तो उसने अपने पति को कहा कि मुझे बहुत जोर से प्यास लगी है। तब वह व्यक्ति लोटा लेकर रथ से उतरकर जल लेने चला गया। जैसे ही वह पत्नी के निकट आया तो वह यह देखकर आश्चर्य से चकित रह गया कि ठीक अपनी ही जैसी सूरत तथा वैसी ही वेश-भूषा में वह व्यक्ति उसकी पत्नी के पास रथ में बैठा हुआ है। उसने क्रोध से कहा कि तू कौन है जो मेरी पत्नी के निकट बैठा हुआ है। दूसरा व्यक्ति बोला यह मेरी पत्नी है। मैं अभी-अभी ससुराल से विदा करा कर ला रहा हूँ।

वे दोनों व्यक्ति परस्पर झगड़ने लगे। तभी राज्य के सिपाही आकर लोटे वाले व्यक्ति को पकड़ने लगे। स्त्री से पूछा, तुम्हारा असली पति कौन सा है? तब पत्नी शान्त ही रही क्योंकि दोनों एक जैसे थे वह किसे अपना पति कहे। वह व्यक्ति ईश्वर से प्रार्थना करता हुआ बोला- हे परमेश्वर यह क्या लीला है कि सच्चा झूठा बन रहा है। तभी आकाशवाणी हुई कि मूर्ख आज बुधवार के दिन तुझे गमन नहीं करना था। तूने किसी की बात नहीं मानी। यह सब लीला बुधदेव भगवान की है। उस व्यक्ति ने बुधदेव भगवान से प्रार्थना की और अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी। तब बुधदेव जी अन्तर्धान हो गए।

वह अपनी स्त्री को लेकर घर आया तथा बुधवार का व्रत वे दोनों पति पत्नि नियमपूर्वक करने लगे। जो व्यक्ति इस कथा को श्रवण करता तथा सुनाता है उसको बुधवार के दिन यात्रा करने में कोई दोष नहीं लगता है, उसको सर्व प्रकार से सुखों की प्राप्ति होती है।

बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत कथा

पूजा विधि

इस दिन बृहस्पतेश्वर महादेव जी की पूजा होती है। दिन में एक समय ही भोजन करें। पीले वस्त्र धारण करें। भोजन भी चने की दाल का होना चाहिए, नमक नहीं खाना चाहिए। पीले रंग के फूल, चने की दाल, पीले कपड़े तथा पीले चन्दन से पूजा करनी चाहिए। पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए। इस व्रत को करने से बृहस्पति जी अति प्रसन्न होते हैं तथा धन और विद्या का लाभ होता है। स्त्रियों के लिए यह व्रत अति आवश्यक है। इस व्रत में केले का पूजन होता है।

व्रत कथा

किसी गाँव में एक साहूकार रहता था, जिसके घर में अन्न, वस्त्र और धन किसी की कोई कमी नहीं थी, परन्तु उसकी स्त्री बहुत ही कृपण थी। किसी भी भिक्षार्थी को कुछ नहीं देती, सारे दिन घर के कामकाज में लगी रहती। एक समय एक साधु-महात्मा बृहस्पतिवार के दिन उसके द्वार पर आये और भिक्षा की याचना की। स्त्री उस समय घर के आँगन को लीप रही थी, इस कारण साधु महाराज से कहने लगी कि महाराज इस समय तो मैं घर लीप रही हूँ आपको कुछ नहीं दे सकती, फिर किसी अवकाश समय आना। साधु महात्मा खाली हाथ चले गए।

कुछ दिन के पश्चात् वही साधु महात्मा आए उसी तरह भिक्षा माँगी। साहूकारनी उस समय लड़के को खिला रही थी। कहने लगी- महाराज मैं क्या करूँ अवकाश नहीं है, इसलिए आपको भिक्षा नहीं दे सकती। तीसरी बार महात्मा आए तो उसने उन्हें उसी तरह टालना चाहा परन्तु महात्मा जी कहने लगे कि यदि तुमको बिल्कुल ही अवकाश हो जाए तो क्या मुझको दोगी? साहूकारनी कहने लगी कि हाँ महाराज यदि ऐसा हो जाए तो आपकी बड़ी कृपा होगी।

साधु-महात्मा जी कहने लगे कि अच्छा मैं एक उपाय बताता हूँ। तुम बृहस्पतिवार को दिन चढ़े उठो और सारे घर में झाड़ू लगा कर कूड़ा एक कोने में जमा करके रख दो। घर में चौका इत्यादि मन लगाओ। फिर स्नान आदि करके घर वालों से कह दो, उस दिन सब हजामत अवश्य बनवायें। रसोई बनाकर चूल्हे के पीछे रखा करो, सामने कभी रक्खो। सांयकाल को अन्धेरा होने के बाद दीपक जलाओ तथा बृहस्पतिवार को पीले वस्त्र मत धारण करो, न पीले रंग की चीजों का भोजन करो। यदि ऐसा करोगे तो तुमको घर का कोई काम नहीं करना पड़ेगा।

साहूकारनी ने ऐसा ही किया। बृहस्पतिवार को दिन चढ़े उठी, झाड़ू लगाकर कूड़े को घर के एक कोने में जमा करके रख दिया। पुरुषों ने हजामत बनवाई। भोजन बनवाकर चूल्हे के पीछे रखा। वह सब बृहस्पतिवारी को ऐसा ही करती रही। अब कुछ काल बाद उसके घर में खाने को दाना न रहा। थोड़े दिनों में महात्मा फिर आए और भिक्षा माँगी परन्तु सेठानी ने कहा महाराज मेरे घर में खाने को अन्न नहीं है, आपको क्या दे सकती हूँ। तब महात्मा ने कहा कि जब तुम्हारे घर में सब कुछ था तब भी कुछ नहीं देती थी। अब पूरा-पूरा अवकाश है तब भी कुछ नहीं दे रही हो, तुम क्या चाहती हो वह कहो?

तब सेठानी ने हाथ जोड़ कर कहा कि महाराज अब कोई ऐसा उपाय बताओ कि मेरे पहले जैसा धन-धान्य हो जाय। अब मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि अवश्यमेव आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूँगी। तब महात्मा जी बोले- बृहस्पतिवार को प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत्त हो घर को गौ के गोबर से लीपो तथा घर के पुरुष हजामत न बनवायें। भूखों को अन्न-जल देती रहा करो। ठीक सायंकाल दीपक जलाओ। यदि ऐसा करोगी तो तुम्हारी सब मनोकामनाएं भगवान् बृहस्पति जी की कृपा से पूर्ण होंगी।

सेठानी ने ऐसा ही किया और उसके घर में धन-धान्य वैसा ही होगा जैसा पहले था। इस प्रकार भगवान् बृहस्पति जी की कृपा से अनेक प्रकार के सुख भोगकर दीर्घकाल तक जीवित रही।

शुक्रवार व्रत कथा

विधि

इस व्रत को करने वाले कथा के पूर्व कलश को पूर्ण भरें, उसके ऊपर गुड़ व चने से भरी कटोरी रखें, कथा कहते व सुनते समय हाथ में भुने चने व गुड़ रखें, सुनने वाले ‘सन्तोषी माता की जय’ इस प्रकार जय-जयकार से बोलते जाएँ। कथा समाप्त होने पर हाथ का गुड़ और चना गौ माता को खिलाएँ। कलश में रखा हुआ गुड़ व चना सबको प्रसाद के रूप में बाँट दें। कथा समाप्त होने और आरती के बाद कलश के जल को घर में सब जगह छिड़कें, बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डालें। माता भावना की भूखी है, कम-ज्यादा का कोई विचार नहीं, अतएव जितना भी बन पड़े प्रसाद अर्पण कर श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न मन से व्रत करना चाहिए। व्रत के उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा, चने का शाक, मोएनदार पूड़ी, खीर, नैवेद्य रखें। घी का दीपक जला संतोषी माता की जय-जयकार बोल नारियल फोड़ें। इस दिन आठ लड़कों को भोजन कराएँ। देवर, जेठ, घर के ही लड़के हों तो दूसरों को बुलाना नहीं, अगर कुटुम्ब में न मिलें तो ब्राह्मणों के, रिश्तेदारों के या पड़ोसी के लड़के बुलाएँ। उन्हें खटाई की कोई वस्तु न दें तथा भोजन करा यथाशक्ति दक्षिणा दें।

कथा

एक समय की बात है कि एक नगर में कायस्थ, ब्राह्मण और वैश्य जाति के तीनों लड़कों में परस्पर मित्रता थी। उन तीनों का विवाह हो गया था। ब्राह्मण और कायस्थ के लड़कों का गौना भी हो गया था, परन्तु वैश्य के लड़के का गौना नहीं हुआ था। एक दिन कायस्थ के लड़के ने कहा- “हे मित्र! तुम मुकलावा करके अपनी स्त्री को घर क्यों नहीं लाते? स्त्री के बिना घर कैसा बुरा लगता है।”

यह बात वैश्य के लड़के को जँच गई। वह कहने लगा कि मैं अभी जाकर मुकलावा लेकर आता हूँ। ब्राह्मण के लड़के ने कहा अभी मत जाओ क्योंकि शुक्र अस्त हो रहा है, जब उदय हो तब जा कर ले आना। परन्तु वैश्य के लड़के को ऐसी जिद हो गई कि किसी प्रकार से नहीं माना। जब उसके घरवालों ने सुना तो उन्होंने बहुत समझाया परन्तु वह किसी प्रकार से नहीं माना और अपनी ससुराल चला गया। उसको आया देखकर ससुराल वाले भी चकराए। जमाता का स्वागत सत्कार करने के बाद उन्होंने पूछा आपका आना कैसे हुआ? वैश्य पुत्र कहने लगा कि मैं अपनी पत्नी को विदा कराने के लिए आया हूँ। ससुराल वालों ने भी उसे बहुत समझाया कि इन दिनों शुक्र अस्त है, उदय होने पर ले जाना, परन्तु उसने एक न सुनी और अपनी पत्नी को ले जाने का आग्रह करता रहा। जब वह किसी प्रकार न माना तो उन्होंने लाचार होकर अपनी पुत्री को विदा कर दिया।

वैश्य पुत्र अपनी पत्नी को एक रथ में बिठा कर अपने घर की ओर चल पड़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद मार्ग में उसके रथ का पहिया टूटकर गिर गया और बैल का पैर टूट गया। उसकी पत्नी भी गिर पड़ी और घायल हो गई। जब आगे चले तो रास्ते में डाकू मिले। उसके पास जो धन, वस्त्र तथा आभूषण थे वह सब उन्होंने छीन लिए।

इस प्रकार अनेक कष्टों का सामना कर जब पति पत्नी अपने घर पहुँचे तो आते ही वैश्य के लड़के को सर्प ने काट लिया, वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।

तब उसकी स्त्री अत्यन्त विलाप कर रोने लगी। वैश्य ने अपने पुत्र को वैद्यों को दिखलाया तो वैद्य कहने लगे- यह तीन दिन में मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। जब उसके मित्र ब्राह्मण को पता लगा तो उसने कहा- “सनातन धर्म की प्रथा है कि जिस समय शुक्र के अस्त हों कोई अपनी स्त्री को नहीं लाता। परन्तु यह शुक्र के अस्त के समय स्त्री को विदा कराके ले आया है इस कारण सारे विघ्न उपस्थित हुए हैं। यदि यह दोनों ससुराल वापिस चले जाएँ और शुक्र के उदय होने पर पुनः आवें तो निश्चय ही विघ्न टल सकता है।”

सेठ ने अपने पुत्र और उसकी स्त्री को शीघ्र ही उसकी ससुराल वापिस पहुँचा दिया। वहाँ पहुँचते ही वैश्य पुत्र की मूर्छा दूर हो गई और साधारण उपचार से ही वह सर्प विष से मुक्त हो गया। अपने दामाद को स्वास्थ्य लाभ करता रहा और जब शुक्र का उदय हुआ तब हर्ष पूर्वक उसकी ससुराल वालों ने उसको अपनी पुत्री के साथ विदा किया। इसके पश्चात् पति पत्नी दोनों घर आकर आनन्द से रहने लगे। इस व्रत के करने से अनेक विघ्न दूर होते हैं।

॥ समाप्त ॥

शनिवार व्रत कथा

विधि

इस दिन शनिदेव की पूजा होती है। काला तिल, काला वस्त्र, तेल, उड़द शनिदेव को अति प्रिय है, इसलिए इनके द्वारा शनिदेव की पूजा की जाती है। शनि स्तोत्र का पाठ भी विशेष लाभदायक सिद्ध होता है।

कथा

एक समय सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु इन सब ग्रहों में आपस में विवाद हो गया कि हममें सबसे बड़ा कौन है? सब अपने आपको बड़ा कहते थे। जब आपस में कोई निश्चय न हो सका तो सब आपस में झगड़ते हुए देवराज इन्द्र के पास गए और कहने लगे कि आप सब देवताओं के राजा हैं इसलिए आप हमारा न्याय करके बतलाएं कि हम नवो ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह कौन है?

देवराज इन्द्र देवताओं का प्रश्न सुनकर घबरा गए और कहने लगे कि मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि मैं किसी को बड़ा या छोटा बतला सकूँ। मैं अपने मुख से कुछ नहीं कह सकता। हाँ एक उपाय हो सकता है। इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य दूसरों के दुःखों का निवारण करने वाले हैं इसलिए आप सब मिलकर उन्हीं के पास जाएँ, वही आपके विवाद का निवारण करेंगे।

सभी ग्रह देवता देवलोक से चलकर भू-लोक में जाकर राजा विक्रमादित्य की सभा में उपस्थित हुए और अपना प्रश्न राजा के सामने रखा। राजा विक्रमादित्य ग्रहों की बात सुनकर गहरी चिन्ता में पड़ गए कि मैं अपने मुख से किसको बड़ा और किसको छोटा बतलाऊँगा? जिसको छोटा बतलाऊँगा वही क्रोध करेगा। उनका झगड़ा निपटाने के लिए उन्होंने एक उपाय सोचा और सोना, चाँदी, काँसा, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा नौ धातुओं के नौ आसन बनवाए। सब आसनों को क्रम से जैसे सोना सबसे पहले और लोहा सबसे पीछे बिछाया गया। इसके पश्चात् राजा ने सब ग्रहों से कहा कि आप सब अपना-अपना आसन ग्रहण करें, जिसका आसन सबसे आगे वह सबसे बड़ा और जिसका सबसे पीछे वह सबसे छोटा जानिए। क्योंकि लोहा सबसे पीछे था और शनिदेव का शासन था इसलिए शनिदेव ने समझ लिया कि राजा ने मुझको सबसे छोटा बना दिया है।

इस निर्णय पर शनिदेव को बहुत क्रोध आया। उन्होंने कहा कि राजा तू मुझे नहीं जानता। सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, बुध और शुक्र एक-एक महीने विचरण करते हैं। परन्तु मैं एक राशि पर ढाई वर्ष से लेकर साढ़े सात वर्ष तक रहता हूँ। बड़े-बड़े देवताओं को भी मैंने भीषण दुःख दिया है। राजन् सुनो! श्रीरामचन्द्रजी को साढ़ेसाती आई और उन्हें वनवास हो गया। रावण पर आई तो राम ने वानरों की सेना लेकर लंका पर चढ़ाई कर दी और रावण के कुल का नाश कर दिया। हे राजन्! अब तुम सावधान रहना।

राजा विक्रमादित्य ने कहा- जो भाग्य में होगा, देखा जाएगा।

इसके बाद अन्य ग्रह तो प्रसन्नता के साथ अपने-अपने स्थान पर चले गए परन्तु शनिदेव क्रोध के साथ वहाँ से सिधारे।

कुछ काल व्यतीत होने पर जब राजा विक्रमादित्य को साढ़ेसाती की दशा आई तो शनिदेव घोड़ों के सौदागर बनकर अनेक घोड़ों के सहित राजा विक्रमादित्य की राजधानी में आए। जब राजा ने घोड़ों के सौदागर के आने की खबर सुनी तो अपने अश्वपाल को अच्छे-अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। अश्वपाल ऐसी अच्छी नस्ल के घोड़े देखकर और एक अच्छा सा घोड़ा चुनकर सवारी के लिए उस पर चढ़े।

राजा के पीठ पर चढ़ते ही घोड़ा तेजी से भागा। घोड़ा बहुत दूर एक घने जंगल में जाकर राजा को छोड़कर अन्तर्धान हो गया। इसके बाद राजा विक्रमादित्य अकेला जंगल में भटकता फिरता रहा। भूख-प्यास से दुःखी राजा ने भटकते-भटकते एक ग्वाले को देखा। ग्वाले ने राजा को प्यास से व्याकुल देखकर पानी पिलाया। राजा की अंगुली में एक अंगूठी थी। वह अंगूठी उसने निकाल कर प्रसन्नता के साथ ग्वाले को दे दी और स्वयं शहर की ओर चल दिया। राजा शहर में पहुँचकर एक सेठ की दुकान पर जाकर बैठ गया और अपने आपको उज्जैन का रहने वाला तथा अपना नाम वीका बतलाया। सेठ ने उसको एक कुलीन मनुष्य समझकर जल आदि पिलाया। भाग्यवश उस दिन सेठ की दुकान पर बहुत अधिक बिक्री हुई तब सेठ उसको भाग्यवान् पुरुष समझकर भोजन के लिए अपने साथ घर ले गया। भोजन करते समय राजा विक्रमादित्य ने एक आश्चर्यजनक घटना देखी, जिस खूंटी पर हार लटक रहा था वह खूंटी उस हार को निगल रही थी।

भोजन के पश्चात् जब सेठ कमरे में आया तो उसे कमरे में हार नहीं मिला। उसने यही निश्चय किया कि सिवाय वीका के कोई और इस कमरे में नहीं आया, अतः अवश्य ही उसी ने हार चोरी किया है। परन्तु वीका ने हार लेने से इन्कार कर दिया। इस पर पाँच सात आदमी उसको पकड़कर नगर कोतवाल के पास ले गए। फौजदार ने उसको राजा के सामने उपस्थित कर दिया और कहा कि यह आदमी भला प्रतीत होता है, चोर मालूम नहीं होता, परन्तु सेठ का कहना है कि इसके सिवाय और कोई घर में आया ही नहीं, इसलिए अवश्य ही चोरी इसने की है। राजा ने आज्ञा दी कि इसके हाथ पैर काटकर चौरंगिया किया जाए। तुरन्त राजा की आज्ञा का पालन किया गया और वीका के हाथ पैर काट दिये गए।

कुछ काल व्यतीत होने पर एक तेली उसको अपने घर ले गया और उसको कोल्हू पर बिठा दिया। वीका उस पर बैठा हुआ अपनी जबान से बैल हांकता रहा। इस काल में राजा की शनि की दशा समाप्त हो गई। वर्षा ऋतु के समय वह मल्हार राग गाने लगा। यह राग सुनकर उस शहर के राजा की कन्या मनभावनी उस राग पर मोहित हो गई। राजकन्या ने राग गाने वाले की खबर लाने के लिए अपनी दासी को भेजा। दासी सारे शहर में घूमती रही। जब वह तेली के घर के निकट से निकली तब क्या देखती है कि तेली के घर में चौरंगिया राग गा रहा है। दासी ने लौटकर राजकुमारी को सब वृत्तांत सुना दिया। बस उसी क्षण राजकुमारी मनभावनी ने अपने मन में यह प्रण लिया चाहे कुछ भी हो मैंने चौरंगिया के साथ ही विवाह करना है।

प्रातःकाल होते ही जब दासी ने राजकुमारी मनभावनी को जगाना चाहा तो राजकुमारी अनशन व्रत लेकर पड़ी रही। दासी ने रानी के पास जाकर राजकुमारी के न उठने का वृत्तांत कहा। रानी ने वहाँ आकर राजकुमारी को जगाया और उसके दुःख का कारण पूछा। राजकुमारी ने कहा कि माताजी मैंने यह प्रण कर लिया है कि तेली के घर में जो चौरंगिया है मैं उसी के साथ विवाह करूँगी। माता ने कहा- पगली, तू यह क्या कह रही है? तुझे किसी देश के राजा के साथ परिणाया जाएगा। कन्या कहने लगी कि माताजी मैं अपना प्रण कभी नहीं तोड़ूंगी। माता ने चिन्तित होकर यह बात महाराज को बताई। महाराज ने भी आकर उसे समझाया कि मैं अभी देश-देशान्तर में अपने दूत भेजकर सुयोग्य, रूपवान एवं बड़े-से-बड़े गुणी राजकुमार के साथ तुम्हारा विवाह करूँगा। ऐसी बात तुम्हें कभी नहीं विचारनी चाहिए। परन्तु राजकुमारी ने कहा- “पिताजी मैं अपने प्राण त्याग दूंगी परन्तु किसी दूसरे से विवाह नहीं करूँगी।” यह सुनकर राजा ने क्रोध से कहा यदि तेरे भाग्य में ऐसा ही लिखा है तो जैसी तेरी इच्छा हो वैसा ही कर। राजा ने तेली को बुलाकर कहा कि तेरे घर में जो चौरंगिया है उसके साथ मैं अपनी कन्या का विवाह करना चाहता हूँ। तेली ने कहा महाराज यह कैसे हो सकता है? राजा ने कहा कि भाग्य के लिखे को कोई नहीं टाल सकता। अपने घर जाकर विवाह की तैयारी करो।

राजा ने सारी तैयारी कर तोरण और बन्दनवार लगवाकर राजकुमारी का विवाह चौरंगिया के साथ कर दिया। रात्रि को जब विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये तब आधी रात के समय शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न दिया और कहा कि राजा मुझको छोटा बतलाकर तुमने कितना दुःख उठाया? राजा ने शनिदेव से क्षमा माँगी। शनिदेव ने राजा को क्षमा कर दिया और प्रसन्न होकर विक्रमादित्य को हाथ-पैर दिये। तब राजा विक्रमादित्य ने शनिदेव से प्रार्थना की- “महाराज मेरी प्रार्थना स्वीकार करें, जैसा दुःख आपने मुझे दिया है ऐसा और किसी को न दें।” शनिदेव ने कहा- तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार है, जो मनुष्य मेरी कथा सुनेगा या कहेगा उसको मेरी दशा में कभी भी दुःख नहीं होगा, जो नित्य मेरा ध्यान करेगा या चींटियों को आटा डालेगा उसके सब मनोरथ पूर्ण होंगे। इतना कह कर शनिदेव अपने धाम को चले गए।

जब राजकुमारी मनभावनी की आँख खुली और उसने चौरंगिया को हाथ-पाँव सहित देखा तो आश्चर्यचकित हो गई, उसको देखकर राजा विक्रमादित्य ने अपना समस्त हाल कहा कि मैं उज्जैन का राजा विक्रमादित्य हूँ। यह घटना सुनकर राजकुमारी अत्यन्त प्रसन्न हुई। प्रातःकाल राजकुमारी से उसकी सखियों ने पिछली रात का हाल-चाल पूछा तो उसने अपने पति का समस्त वृत्तांत कह सुनाया। तब सबने प्रसन्नता प्रकट की और कहा कि ईश्वर ने आपकी मनोकामना पूर्ण कर दी। जब उस सेठ ने यह घटना सुनी तो वह राजा विक्रमादित्य के पास आया और उनके पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा कि आप पर मैंने चोरी का झूठा दोष लगाया। आप जो चाहे मुझे दण्ड दें। राजा ने कहा- मुझ पर शनिदेव का कोप था इसी कारण यह सब दुःख मुझको प्राप्त हुए, इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुम अपने घर जाकर अपना कार्य करो, तुम्हारा कोई अपराध नहीं। सेठ बोला- “महाराज मुझे तभी शान्ति मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर प्रीतिपूर्वक भोजन करेंगे”। राजा ने कहा जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करें।

सेठ ने अपने घर जाकर अनेक प्रकार के सुन्दर व्यंजन बनवाए और राजा विक्रमादित्य को प्रीतिभोज दिया। जिस समय राजा भोजन कर रहे थे एक आश्चर्यजनक घटना घटती सबको दिखाई दी। जो खूंटी पहले हार निगल गई थी, वह अब हार उगल रही थी। जब भोजन समाप्त हो गया तो सेठ ने हाथ जोड़कर बहुत सी मोहरें राजा को भेंट कीं और कहा- “मेरी श्रीकंवरी नामक एक कन्या है उसका आप पाणिग्रहण करें।” राजा विक्रमादित्य ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब सेठ ने अपनी कन्या का विवाह राजा के साथ कर दिया और बहुत सा दान-दहेज आदि दिया। कुछ दिन तक उस राज्य में निवास करने के पश्चात् राजा विक्रमादित्य ने अपने श्वसुर राजा से कहा कि अब मेरी उज्जैन जाने की इच्छा है।

कुछ दिन बाद विदा लेकर राजकुमारी मनभावनी, सेठ की कन्या तथा दोनों जगह से मिला दहेज में प्राप्त अनेक दास-दासी, रथ और पालकियों सहित राजा विक्रमादित्य उज्जैन की तरफ चले। जब वे शहर के निकट पहुंचे और पुरवासियों ने राजा के आने का सम्वाद सुना तो उज्जैन की समस्त प्रजा अगवानी के लिए आई। प्रसन्नता से राजा अपने महल में पधारे। सारे नगर में भारी उत्सव मनाया गया और रात्रि को दीपमाला की गई। दूसरे दिन राजा ने अपने पूरे राज्य में यह घोषणा करवाई कि शनि देवता सब ग्रहों में सर्वोपरि है। मैंने इनको छोटा बतलाया इसी से मुझको यह दुःख प्राप्त हुआ।

इस प्रकार सारे राज्य में सदा शनिदेव की पूजा और कथा होने लगी। राजा और प्रजा अनेक प्रकार के सुख भोगती रही। जो कोई शनिदेव की इस कथा को पढ़ता या सुनता है, शनिदेव की कृपा से उसके सब दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन शनिदेव की कथा को अवश्य पढ़ना चाहिए।

॥ समाप्त ॥

रविवार व्रत कथा

पूजा विधि

सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु रविवार का व्रत श्रेष्ठ है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है। प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शान्तचित्त होकर परमात्मा का स्मरण करें। भोजन तथा फलाहार सूर्य के प्रकाश रहते ही कर लेना उचित है। यदि निराहार रहने पर सूर्य छिप जाए तो दूसरे दिन सूर्य उदय होने पर अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करें। व्रत के दिन नमकीन तेलयुक्त भोजन कदापि ना करें। इस व्रत को करने से मान-सम्मान बढ़ता है तथा शत्रुओं का क्षय होता है। आँख की पीड़ा के अतिरिक्त अन्य सब पीड़ायें दूर होती हैं।

कथा

एक बुढ़िया थी। उसका नियम था प्रति रविवार को सबेरे-सबेरे ही स्नान आदि कर घर को गौ के गोबर से लीपकर फिर भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन करती थी। ऐसा व्रत करने से उसका घर अनेक प्रकार के धन-धान्य से पूर्ण था। श्री हरि की कृपा से घर में किसी प्रकार का विघ्न या दुःख नहीं था। सब प्रकार से घर में आनन्द रहता था। इस तरह कुछ दिन बीत जाने पर उसकी एक पड़ोसन जिसकी गौ का गोबर वह बुढ़िया लाया करती थी, विचार करने लगी कि यह वृद्धा सर्वदा मेरी गौ का गोबर ले जाती है। इसलिए अपनी गौ को घर के भीतर बांधने लगी। बुढ़िया को गोबर ना मिलने से रविवार के दिन अपने घर को न लीप सकी। इसलिए उसने न तो भोजन बनाया न भगवान को भोग लगाया तथा स्वयं भी भोजन नहीं किया। इस प्रकार उसने निराहार व्रत किया। रात्रि हो गई और वह भूखी सो गई। रात्रि में भगवान ने उसे स्वप्न दिया और भोजन न बनाने तथा लगाने का कारण पूछा। वृद्धा ने गोबर न मिलने का कारण सुनाया तब भगवान ने कहा कि माता हम तुमको ऐसी गौ देते हैं जिससे सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं क्योंकि तुम हमेशा रविवार को गौ के गोबर से घर को लीपकर भोजन बनाकर मेरा भोग लगाकर खुद भोजन करती हो। इससे मैं खुश होकर तुमको वरदान देता हूँ। निर्धन को धन और बाँझ स्त्रियों को पुत्र देकर दुःखों को दूर करता हूँ तथा अन्त समय में मोक्ष देता हूँ।

स्वप्न में ऐसा वरदान देकर भगवान तो अन्तर्धान हो गए और वृद्धा की आँख खुली तो वह देखती है कि आंगन में एक अति सुन्दर गौ और बछड़ा बंधे हुए हैं। वह गाय और बछड़े को देखकर अतीव प्रसन्न हुई और उसको घर के बाहर बांध दिया और वहीं खाने को चारा डाल दिया। जब उसकी पड़ोसन ने बुढ़िया के घर के बाहर एक अति सुन्दर गौ और बछड़ा देखा तो द्वेष के कारण उसका हृदय जल उठा और उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है तो वह उस गाय का गोबर ले गई और अपनी गाय का गोबर उसकी जगह पर रख गई। वह नित्यप्रति ऐसा ही करती रही और सीधी-साधी बुढ़िया को इसकी खबर नहीं होने दी। तब सर्वव्यापी ईश्वर ने सोचा कि चालाक पड़ोसन के कर्म से बुढ़िया ठगी जा रही है तो ईश्वर ने संध्या के समय अपनी माया से बहुत जोर की आँधी चला दी। बुढ़िया ने अन्धेरी के भय से अपनी गौ को अन्दर बांध लिया। प्रातःकाल जब बुढ़िया ने देखा कि गौ ने सोने का गोबर दिया है तो उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही और वह प्रतिदिन गऊ को घर के भीतर बांधने लगी। उधर पड़ोसन ने देखा कि बुढ़िया गऊ को घर के भीतर बांधने लगी है और उसका सोने का गोबर उठाने का दाँव नहीं चलता तो वह ईर्ष्या और डाह से जल उठी और कुछ उपाय न देख पड़ोसन ने उस देश के राजा की सभा में जाकर कहा महाराज मेरे पड़ोस में एक वृद्धा के पास ऐसी गऊ है जो आप जैसे राजाओं के ही योग्य है, वह नित्य सोने का गोबर देती है। आप उस सोने से प्रजा का पालन करिए।

वह वृद्धा इतने सोने का क्या करेगी। राजा ने यह बात सुन अपने दूतों को वृद्धा के घर से गऊ लाने की आज्ञा दी। वृद्धा प्रातः ईश्वर का भोग लगा भोजन ग्रहण करने ही जा रही थी कि राजा के कर्मचारी गऊ खोल कर ले गए। वृद्धा काफी रोई-चिल्लाई किन्तु कर्मचारियों के समक्ष कोई क्या कहता। उस दिन वृद्धा गऊ के वियोग में भोजन न खा सकी और रात भर रो-रो ईश्वर से गऊ को पुनः पाने के लिए प्रार्थना करती रही। उधर राजा गऊ को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ लेकिन सुबह जैसे ही वह उठा सारा महल गोबर से भरा दिखाई देने लगा। राजा यह देख घबरा गया। भगवान ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा कि हे राजा! गाय को वृद्धा को लौटाने में ही तेरा भला है, उसके रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर मैंने उसे गाय दी थी। प्रातः होने पर राजा ने वृद्धा को बुलाकर बहुत से धन के साथ सम्मान के सहित गऊ और बछड़ा लौटा दिया। उसकी पड़ोसन को बुलाकर उचित दण्ड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से गन्दगी दूर हुई। उसी दिन से राजा ने नगरवासियों को आदेश दिया कि राज्य की तथा अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए रविवार का व्रत करो। व्रत करने से नगर के लोग सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। कोई भी बीमारी तथा प्रकृति का प्रकोप उस नगर पर नहीं होता था। सारी प्रजा सुख से रहने लगी।

॥ समाप्त ॥

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — सप्तवार (सातों वार) व्रत कथा, पृष्ठ 314–354

    सातों वार के व्रत की विधि एवं कथाएँ पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से अक्षरशः उतारी गईं और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित की गईं।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।