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वेद पथ वैदिक ज्ञान का पथ

पथवारी माता कथा

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यह कथा शीतला अष्टमी तथा कार्तिक पूजा के समय पथवारी पूजते समय कही जाती है।

पथवारी माता कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक गुजरी माई थी। उसके दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं को सास ने दूध बेचने के लिए पास के गाँव में भेजा। बड़ी बहू काफी होशियार थी और पैसों का हिसाब भी रखना जानती थी, इसलिए रोज दूध बेचकर सारे पैसे लाकर सास को दे देती थी। इसके विपरीत छोटी बहू बहुत भोली थी। उसे हिसाब लगाना नहीं आता था।

एक दिन जब वह दूध बेचने जा रही थी तब उसने देखा कुछ महिलाएं पथवारी पूजन कर रही हैं तथा पीपल के पेड़ को जल से सींच रही हैं। बहू ने उन महिलाओं से पूछा पथवारी पूजन कर सींचने से क्या फल मिलता है। इस पर उन महिलाओं ने बताया पथवारी माता सींचने से अन्न, धन तथा लक्ष्मी मिलती है। महिलाओं की बातें सुनकर छोटी बहू ने दूध वहीं बड़े पीपल पर चढ़ा पथवारी माता को सींच दिया। वह हर दिन इसी तरह दूध ले जाती तथा पथवारी सींच आती।

कुछ दिन बाद जब सास ने बहू से दूध के पैसे मांगे तो उसने दूसरे दिन लाने को कह दिया, लेकिन वह अगले दिन भी पैसे नहीं लाई। इस तरह पूरा एक महीना बीत गया। तब सास ने कहा आज पैसे लेकर ही आना। अगले दिन जब वह पैसे लेने के लिए घर से चली तो उदास होकर पथवारी माता के चबूतरे के समीप बैठ गई। तभी पथवारी माता बुढ़िया का रूप धारण करके आई और बोली, बेटी तुम उदास क्यों बैठी हो? बहू बोली मेरी सास मुझे रोज दूध बेचने भेजती थी मगर मुझे दूध बेचना आता ही नहीं, इसलिए मैं तो पथवारी माता को दूध से सींच देती थी। आज सास ने पैसे लेकर आने को कहा है। अब आप ही बताएं मैं पैसे कहाँ से लेकर जाऊँ।

बुढ़िया माई बोली बेटी यह पत्थर पड़े हैं, इन्हें टोकरी में भरकर ले जा और इन पत्थरों को कोठे में रख देना। बहू ने बुढ़िया के कहे अनुसार पत्थर टोकरे में भर लिए और घर लौट कर कोठे में रख दिया। हमेशा की तरह जब सास ने पैसे मांगे तो बहू बोली माँजी कोठे में रखे हैं। सास ने जैसे ही कोठे का दरवाजा खोला तो देखा उसमें अपार हीरे-मोती धन रखा है। सास ने छोटी बहू से पूछा इतना धन कहाँ से लाई है? इस पर बहू ने कहा मैं हर रोज पथवारी माता को सींच देती थी, उन्हीं की कृपा से ये धन मिला है।

यह सारी बात जब बड़ी बहू को पता चली तो उसने सोचा छोटी तो कच्चा दूध सींचती थी, मैं तो गरम दूध से सींचूँगी। यह सोच वह गरम-गरम दूध रोज सींचने लगी। छोटी बहू की तरह पूरा महीना बीतने पर वह पथवारी माता के पास जाकर बैठ गई। पथवारी माता बुढ़िया के रूप में आई और बोली बेटी क्या चाहिए? बड़ी बहू बोली मैं हर रोज पथवारी माता के गरम-गरम दूध सींचती रही हूँ। अब सास पैसे माँग रही है, कहाँ से लाऊँ पैसे? इस पर बुढ़िया माई बोली यह पत्थर रखे हैं तू भी ले जा।

बड़ी बहू ने ढेर सारे पत्थर टोकरी में भरे और बड़ी मुश्किल से घर तक पहुँची कि ठोकर खा कर गिर पड़ी। सारे पत्थर घर के आगे गिर पड़े। आने-जाने वाले ठोकरें खाते और कोसते। वह पुनः पथवारी माता के पास जाकर बोली हे माता तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? तब पथवारी माता बोली छोटी बहू ने बड़ी लगन एवं भाव से और बिना लालच के दूध सींचा था और तूने लालच से मेरे ऊपर गरम-गरम दूध चढ़ाया, जिससे मेरे शरीर पर फफोले पड़ गए हैं। बड़ी बहू को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने माफी मांगी। पथवारी माता ने उसे माफ कर दिया।

॥ बोलो पथवारी माता की जय ॥

स्रोत 1

  • Vrat Katha (Archive.org - VratKathaBook) — पथवारी माता कथा, पृष्ठ 295–296

    पुस्तक के स्कैन किए गए पृष्ठ-चित्रों से पाठ अक्षरशः उतारा गया और मानक हिंदी वर्तनी में सम्पादित किया गया।

अर्थ वेद पथ संपादकीय टीम द्वारा संकलित एवं संपादित हैं, और सामग्री की क्रमशः समीक्षा की जा रही है।