ऋषय ऊचुः ।
कथं सङ्कल्पसिद्धिः स्याद्वेदव्यास कलौ युगे ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं किमुदाहृतम् ॥ १॥
अर्थ ऋषि बोले — हे वेदव्यास! कलियुग में संकल्प की सिद्धि किस प्रकार हो? धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन क्या बताया गया है?
व्यास उवाच ।
शृण्वन्तुऋषयः सर्वे शीघ्रं सङ्कल्पसाधनम् ।
सकृदुच्चारमात्रेण भोगमोक्षप्रदायकम् ॥ २॥
अर्थ व्यास बोले — हे सब ऋषियो! संकल्प-सिद्धि का शीघ्र साधन सुनो, जो केवल एक बार उच्चारण करने मात्र से ही भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करता है।
गौरीशृङ्गे हिमवतः कल्पवृक्षोपशोभितम् ।
दीप्ते दिव्यमहारत्नहेममण्डपमध्यगम् ॥ ३॥
अर्थ हिमालय के गौरीशृंग पर, कल्पवृक्ष से सुशोभित, देदीप्यमान दिव्य महारत्नों एवं स्वर्ण से बने मण्डप के मध्य में —
रत्नसिंहासनासिनं प्रसन्नं परमेश्वरम् ।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं शङ्करं प्राह पार्वती ॥ ४॥
अर्थ रत्नमय सिंहासन पर विराजमान, प्रसन्नमुख, मन्द मुस्कान से युक्त कमल-सदृश मुख वाले परमेश्वर शंकर से पार्वती ने कहा।
श्रीदेव्युवाच ।
देवदेव महादेव लोकशङ्कर शङ्कर ।
मन्त्रजालानि सर्वाणि यन्त्रजालानि कृत्स्नशः ॥ ५॥
अर्थ श्रीदेवी बोलीं — हे देवदेव! महादेव! लोकों का कल्याण करने वाले शंकर! समस्त मन्त्रजाल, सम्पूर्ण यन्त्रजाल,
तन्त्रजालान्यनेकानि मया त्वत्तः श्रुतानि वै ।
इदानीं द्रष्टुमिच्छामि विशेषेण महीतलम् ॥ ६॥
अर्थ तथा अनेक तन्त्रजाल — ये सब मैंने आपसे सुने हैं। अब मैं विशेष रूप से इस पृथ्वीतल (मर्त्यलोक) को देखना चाहती हूँ।
इत्युदीरितमाकर्ण्य पार्वत्या परमेश्वरः ।
करेणामृज्य सन्तोषात्पार्वतीं प्रत्यभाषत ॥ ७॥
अर्थ पार्वती के इस प्रकार कहे हुए वचन सुनकर परमेश्वर ने प्रसन्नता से हाथ फेरकर पार्वती से कहा —
मयेदानीं त्वया सार्धं वृषमारुह्य गम्यते ।
इत्युक्त्वा वृषमारुह्य पार्वत्या सह शङ्करः ॥ ८॥
अर्थ “अब मैं तुम्हारे साथ वृषभ पर सवार होकर चलूँ।” ऐसा कहकर पार्वती सहित शंकर वृषभ पर सवार होकर —
ययौ भूमण्डलं द्रष्टुं गौर्याश्चित्राणि दर्शयन् ।
क्वचित् विन्ध्याचलप्रान्ते महारण्ये सुदुर्गमे ॥ ९॥
अर्थ गौरी को विचित्र दृश्य दिखाते हुए भूमण्डल देखने चले। कहीं विन्ध्याचल के प्रान्त में, अत्यन्त दुर्गम महारण्य में —
तत्र व्याहर्तुमायान्तं भिल्लं परशुधारिणम् ।
वर्ध्यमानं महाव्याघ्रं नखदंष्ट्राभिरावृतम् ॥ १०॥
अर्थ (उन्होंने देखा) आखेट के लिए आते हुए, फरसा धारण किए एक भील को, और नख-दाढ़ों से युक्त, बढ़ते हुए एक महाव्याघ्र को।
अतीव चित्रचारित्र्यं वज्रकायसमायुतम् ।
अप्रयत्नमनायासमखिलं सुखमास्थितम् ॥ ११॥
अर्थ अत्यन्त विचित्र आचरण वाला, वज्र-सदृश (अभेद्य) काया से युक्त, बिना किसी प्रयत्न एवं परिश्रम के पूर्ण सुख में स्थित (वह भील था)।
पलायन्तं मृगं पश्चाद्व्याघ्रो भीत्या पलायितः ।
एतदाश्चर्यमालोक्य पार्वती प्राह शङ्करम् ॥ १२॥
अर्थ भागते हुए मृग के पीछे व्याघ्र भय से भाग रहा था। इस आश्चर्य को देखकर पार्वती ने शंकर से कहा —
श्रीपार्वत्युवाच ।
किमाश्चर्यं किमाश्चर्यमग्रे शम्भो निरीक्ष्यताम् ।
इत्युक्तः स ततः शम्भुर्दृष्ट्वा प्राह पुराणवित् ॥ १३॥
अर्थ श्रीपार्वती बोलीं — हे शम्भो! कैसा आश्चर्य, कैसा आश्चर्य! आगे तो देखिए। ऐसा कहे जाने पर पुराणों के ज्ञाता शम्भु ने देखकर कहा —
श्रीशङ्कर उवाच ।
गौरि वक्ष्यामि ते चित्रमवाङ्मानसगोचरम् ।
अदृष्टपूर्वमस्माभिर्नास्ति किञ्चन्न कुत्रचित् ॥ १४॥
अर्थ श्रीशंकर बोले — हे गौरी! मैं तुम्हें वाणी और मन की पहुँच से परे एक आश्चर्य बताता हूँ, जो हमने पहले कभी नहीं देखा और कहीं भी जिसके समान कुछ नहीं है।
मया सम्यक् समासेन वक्ष्यते शृणु पार्वति ।
अयं दूरश्रवा नाम भिल्लः परमधार्मिकः ॥ १५॥
अर्थ हे पार्वती! मैं इसे भलीभाँति संक्षेप में कहता हूँ, सुनो। यह दूरश्रवा नामक भील परम धार्मिक है।
समित्कुशप्रसूनानि कन्दमूलफलादिकम् ।
प्रत्यहं विपिनं गत्वा समादाय प्रयासतः ॥ १६॥
अर्थ प्रतिदिन वन में जाकर, परिश्रमपूर्वक समिधा, कुश, पुष्प, कन्द, मूल, फल आदि एकत्र करके —
प्रिये पूर्वं मुनीन्द्रेभ्यः प्रयच्छति न वाञ्छति ।
तेऽपि तस्मिन्नपि दयां कुर्वते सर्वमौनिनः ॥ १७॥
अर्थ हे प्रिये! वह पहले मुनीन्द्रों को अर्पित करता है और (बदले में) कुछ नहीं चाहता; वे समस्त मौनी मुनि भी उस पर दया करते हैं।
दलादनो महायोगी वसन्नेव निजाश्रमे ।
कदाचिदस्मरत् सिद्धं दत्तात्रेयं दिगम्बरम् ॥ १८॥
अर्थ दलादन नामक महायोगी अपने आश्रम में रहते हुए एक बार सिद्ध, दिगम्बर दत्तात्रेय का स्मरण करने लगे।
दत्तात्रेयः स्मर्तृगामी चेतिहासं परीक्षितुम् ।
तत्क्षणात्सोऽपि योगीन्द्रो दत्तात्रेयः समुत्थितः ॥ १९॥
अर्थ “दत्तात्रेय स्मरण करते ही आ जाते हैं” — इस बात की परीक्षा लेने के लिए (उन्होंने स्मरण किया); उसी क्षण वे योगीन्द्र दत्तात्रेय प्रकट हो गए।
तं दृष्ट्वाऽऽश्चर्यतोषाभ्यां दलादनमहामुनिः ।
सम्पूज्याग्रे निषीदन्तं दत्तात्रेयमुवाच तम् ॥ २०॥
अर्थ उन्हें देखकर आश्चर्य और सन्तोष से महामुनि दलादन ने पूजा करके, सम्मुख बैठे हुए दत्तात्रेय से कहा —
मयोपहूतः सम्प्राप्तो दत्तात्रेय महामुने ।
स्मर्तृगामी त्वमित्येतत् किंवदन्ती परीक्षितुम् ॥ २१॥
अर्थ “हे महामुनि दत्तात्रेय! मेरे बुलाने पर आप आ गए। ‘आप स्मरण करने मात्र से आ जाते हैं’ — इस किंवदन्ती की परीक्षा हेतु —
मयाद्य संस्मृतोऽसि त्वमपराधं क्षमस्व मे ।
दत्तात्रेयो मुनिं प्राह मम प्रकृतिरीदृशी ॥ २२॥
अर्थ आज मैंने आपका स्मरण किया; मेरा अपराध क्षमा करें।” दत्तात्रेय ने मुनि से कहा — “मेरा स्वभाव ही ऐसा है —
अभक्त्या वा सुभक्त्या वा यः स्मरेन्मामनन्यधीः ।
तदानीं तमुपागत्य ददामि तदभीप्सितम् ॥ २३॥
अर्थ भक्ति से हो अथवा बिना भक्ति के, जो अनन्य मन से मेरा स्मरण करता है, उसी क्षण मैं उसके पास आकर उसकी अभीष्ट वस्तु दे देता हूँ।”
दत्तात्रेयो मुनिं प्राह दलादनमुनीश्वरम् ।
यदिष्टं तद्वृणीष्व त्वं यत् प्राप्तोऽहं त्वया स्मृतः ॥ २४॥
अर्थ दत्तात्रेय ने मुनीश्वर दलादन से कहा — “तुम्हारे स्मरण करने से मैं आ पहुँचा हूँ; अतः जो अभीष्ट हो वही माँग लो।”
दत्तात्रेयं मुनिः प्राह मया किमपि नोच्यते ।
त्वच्चित्ते यत्स्थितं तन्मे प्रयच्छ मुनिपुङ्गव ॥ २५॥
अर्थ मुनि ने दत्तात्रेय से कहा — “मैं कुछ नहीं कहता (माँगता); हे मुनिश्रेष्ठ! आपके चित्त में जो स्थित हो, वही मुझे प्रदान करें।”
श्रीदत्तात्रेय उवाच ।
ममास्ति वज्रकवचं गृहाणेत्यवदन्मुनिम् ।
तथ्येत्यङ्गीकृतवते दलादनमुनये मुनिः ॥ २६॥
अर्थ श्रीदत्तात्रेय बोले — “मेरे पास एक वज्रकवच है, उसे ग्रहण करो” — ऐसा उन्होंने मुनि से कहा। “तथास्तु” कहकर स्वीकार करने वाले दलादन मुनि को —
स्ववज्रकवचं प्राह ऋषिच्छन्दःपुरःसरम् ।
न्यासं ध्यानं फलं तत्र प्रयोजनमशेषतः ॥ २७॥
अर्थ (दत्तात्रेय ने) अपना वज्रकवच ऋषि, छन्द सहित कहा, तथा उसमें न्यास, ध्यान, फल और सम्पूर्ण प्रयोजन भी (बताया)।