अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः ,
चामुण्डा देवता , अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् ,
दिग्बन्धदेवतास्तत्वम् , श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
ॐ नमश्चण्डिकायै ।
मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १॥
अर्थ विनियोग — इस श्रीचण्डी-कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता चामुण्डा हैं, अङ्गन्यास में कही गई मातृकाएँ बीज हैं, दिग्बन्ध की देवता तत्त्व हैं; और श्रीजगदम्बा की प्रसन्नता के लिए जप में इसका विनियोग है। ॐ चण्डिका को नमस्कार है। मार्कण्डेय जी बोले — हे पितामह (ब्रह्मा)! संसार में जो परम गुप्त तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है, और जो अब तक किसी को नहीं बताया गया, वह मुझे बताइए।
ब्रह्मोवाच ।
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥ २॥
brahmovāca |
asti guhyatamaṃ vipra sarvabhūtopakārakam |
devyāstu kavacaṃ puṇyaṃ tacchṛṇuṣva mahāmune || 2||
अर्थ ब्रह्मा जी बोले — हे विप्र! हे महामुनि! सब प्राणियों का उपकार करने वाला देवी का एक अत्यन्त गोपनीय और पुण्यमय कवच है; उसे तुम सुनो।
प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३॥
prathamaṃ śailaputrīti dvitīyaṃ brahmacāriṇī |
tṛtīyaṃ candraghaṇṭeti kūṣmāṇḍeti caturthakam || 3||
अर्थ देवी का पहला रूप शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरा चन्द्रघण्टा और चौथा कूष्माण्डा कहलाता है।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनी तथा ।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४॥
pañcamaṃ skandamāteti ṣaṣṭhaṃ kātyāyanī tathā |
saptamaṃ kālarātriśca mahāgaurīti cāṣṭamam || 4||
अर्थ पाँचवाँ रूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी है।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५॥
navamaṃ siddhidātrī ca navadurgāḥ prakīrtitāḥ |
uktānyetāni nāmāni brahmaṇaiva mahātmanā || 5||
अर्थ नवाँ रूप सिद्धिदात्री है — इस प्रकार ये नवदुर्गाएँ कही गई हैं। ये नाम महात्मा ब्रह्मा जी ने ही बताए हैं।
अग्निना दह्यमानास्तु शत्रुमध्यगता रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥ ६।
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे ।
आपदं न च पश्यन्ति शोकदुःखभयङ्करीम् ॥ ७॥
agninā dahyamānāstu śatrumadhyagatā raṇe |
viṣame durgame caiva bhayārtāḥ śaraṇaṃ gatāḥ || 6|
na teṣāṃ jāyate kiñcidaśubhaṃ raṇasaṅkaṭe |
āpadaṃ na ca paśyanti śokaduḥkhabhayaṅkarīm || 7||
अर्थ जो लोग आग में जलते हुए, युद्ध में शत्रुओं के बीच घिरे हुए, विषम और दुर्गम स्थानों में फँसे हुए तथा भय से पीड़ित होकर देवी की शरण में जाते हैं — रणसंकट में उनका कुछ भी अशुभ नहीं होता, और वे शोक, दुःख तथा भय उत्पन्न करने वाली किसी विपत्ति को नहीं देखते।
यैस्तु भक्त्या स्मृता नित्यं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसि तान्न संशयः ॥ ८॥
yaistu bhaktyā smṛtā nityaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate |
ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣasi tānna saṃśayaḥ || 8||
अर्थ जो लोग भक्तिपूर्वक नित्य आपका स्मरण करते हैं, उनकी वृद्धि (उन्नति) होती है। हे देवेशि! जो आपका स्मरण करते हैं, आप निःसन्देह उनकी रक्षा करती हैं।
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥ ९॥
pretasaṃsthā tu cāmuṇḍā vārāhī mahiṣāsanā |
aindrī gajasamārūḍhā vaiṣṇavī garuḍāsanā || 9||
अर्थ चामुण्डा प्रेत (शव) पर विराजमान हैं, वाराही भैंसे पर आसीन हैं, ऐन्द्री (इन्द्राणी) हाथी पर सवार हैं और वैष्णवी गरुड़ पर बैठी हैं।
नारसिंही महावीर्या शिवदूती महाबला ।
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ॥ १०॥
nārasiṃhī mahāvīryā śivadūtī mahābalā |
māheśvarī vṛṣārūḍhā kaumārī śikhivāhanā || 10||
अर्थ महापराक्रमशालिनी नारसिंही और महाबलवती शिवदूती हैं; माहेश्वरी वृषभ (बैल) पर सवार हैं और कौमारी मयूर पर विराजमान हैं।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ।
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ॥ ११॥
lakṣmīḥ padmāsanā devī padmahastā haripriyā |
śvetarūpadharā devī īśvarī vṛṣavāhanā || 11||
अर्थ कमल पर विराजमान, हाथ में कमल धारण करने वाली, हरि (विष्णु) की प्रिया देवी लक्ष्मी हैं; तथा श्वेत रूप धारण करने वाली देवी ईश्वरी वृषभ पर सवार हैं।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ।
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ॥ १२॥
brāhmī haṃsasamārūḍhā sarvābharaṇabhūṣitā |
ityetā mātaraḥ sarvāḥ sarvayogasamanvitāḥ || 12||
अर्थ ब्राह्मी हंस पर सवार हैं और सब आभूषणों से विभूषित हैं। इस प्रकार ये सभी मातृकाएँ समस्त योग-सिद्धियों से सम्पन्न हैं।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ।
श्रैष्ठैश्च मौक्तिकैः सर्वा दिव्यहारप्रलम्बिभिः ॥ १३॥
nānābharaṇaśobhāḍhyā nānāratnopaśobhitāḥ |
śraiṣṭhaiśca mauktikaiḥ sarvā divyahārapralambibhiḥ || 13||
अर्थ वे सब भाँति-भाँति के आभूषणों की शोभा से युक्त और अनेक रत्नों से सुशोभित हैं, तथा दिव्य हारों में लटकते हुए श्रेष्ठ मोतियों से अलंकृत हैं।
इन्द्रनीलैर्महानीलैः पद्मरागैः सुशोभनैः ।
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ॥ १४॥
indranīlairmahānīlaiḥ padmarāgaiḥ suśobhanaiḥ |
dṛśyante rathamārūḍhā devyaḥ krodhasamākulāḥ || 14||
अर्थ इन्द्रनील, महानील और सुन्दर पद्मराग मणियों से सुशोभित, क्रोध से भरी हुई वे देवियाँ रथ पर सवार दिखाई देती हैं।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ।
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ॥ १५॥
śaṅkhaṃ cakraṃ gadāṃ śaktiṃ halaṃ ca musalāyudham |
kheṭakaṃ tomaraṃ caiva paraśuṃ pāśameva ca || 15||
अर्थ शंख, चक्र, गदा, शक्ति (बरछी), हल, मूसल, ढाल (खेटक), तोमर, फरसा (परशु) और पाश —
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ।
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ॥ १६॥
kuntāyudhaṃ triśūlaṃ ca śārṅgamāyudhamuttamam |
daityānāṃ dehanāśāya bhaktānāmabhayāya ca || 16||
अर्थ — कुन्त (भाला), त्रिशूल और उत्तम शार्ङ्ग धनुष — इन आयुधों को वे दैत्यों के शरीरों के नाश के लिए और भक्तों को अभयदान देने के लिए धारण करती हैं।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ।
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ॥ १७॥
dhārayantyāyudhānītthaṃ devānāṃ ca hitāya vai |
namaste'stu mahāraudre mahāghoraparākrame || 17||
अर्थ इस प्रकार वे देवताओं के हित के लिए इन आयुधों को धारण करती हैं। हे महारौद्रे! हे महाघोर पराक्रम वाली देवी! आपको नमस्कार हो।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ॥ १८॥
mahābale mahotsāhe mahābhayavināśini |
trāhi māṃ devi duṣprekṣye śatrūṇāṃ bhayavardhini || 18||
अर्थ हे महाबल वाली, महान् उत्साह वाली, महान् भय को नष्ट करने वाली! हे देखने में भी दुष्कर (दुष्प्रेक्ष्ये) तथा शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली देवी! मेरी रक्षा कीजिए।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैरृत्यां खड्गधारिणी ॥ १९॥
prācyāṃ rakṣatu māmaindrī āgneyyāmagnidevatā |
dakṣiṇe'vatu vārāhī nairṛtyāṃ khaḍgadhāriṇī || 19||
अर्थ पूर्व दिशा में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें, अग्निकोण (दक्षिण-पूर्व) में अग्निदेवता, दक्षिण में वाराही और नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम) में खड्गधारिणी रक्षा करें।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी ।
उदीच्यां पातु कौबेरी ईशान्यां शूलधारिणी ॥ २०॥
pratīcyāṃ vāruṇī rakṣedvāyavyāṃ mṛgavāhinī |
udīcyāṃ pātu kauberī īśānyāṃ śūladhāriṇī || 20||
अर्थ पश्चिम में वारुणी रक्षा करें, वायव्यकोण (उत्तर-पश्चिम) में मृगवाहिनी, उत्तर में कौबेरी और ईशानकोण (उत्तर-पूर्व) में शूलधारिणी रक्षा करें।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ।
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ॥ २१॥
ūrdhvaṃ brahmāṇī me rakṣedadhastādvaiṣṇavī tathā |
evaṃ daśa diśo rakṣeccāmuṇḍā śavavāhanā || 21||
अर्थ ऊपर की ओर ब्रह्माणी मेरी रक्षा करें और नीचे की ओर वैष्णवी रक्षा करें। इस प्रकार शव पर सवार चामुण्डा दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।
जया मामग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ।
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ॥ २२॥
jayā māmagrataḥ pātu vijayā pātu pṛṣṭhataḥ |
ajitā vāmapārśve tu dakṣiṇe cāparājitā || 22||
अर्थ जया आगे से मेरी रक्षा करें, विजया पीछे से रक्षा करें; अजिता बाईं ओर और अपराजिता दाईं ओर से रक्षा करें।
शिखां मे द्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ।
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी ॥ २३॥
śikhāṃ me dyotinī rakṣedumā mūrdhni vyavasthitā |
mālādharī lalāṭe ca bhruvau rakṣedyaśasvinī || 23||
अर्थ मेरी शिखा (चोटी) की द्योतिनी रक्षा करें, मस्तक पर स्थित उमा रक्षा करें; ललाट पर मालाधरी और भौंहों की यशस्विनी रक्षा करें।
नेत्रयोश्चित्रनेत्रा च यमघण्टा तु पार्श्वके ।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन भ्रुवोर्मध्ये च चण्डिका ॥ २४॥
netrayościtranetrā ca yamaghaṇṭā tu pārśvake |
trinetrā ca triśūlena bhruvormadhye ca caṇḍikā || 24||
अर्थ दोनों नेत्रों की चित्रनेत्रा रक्षा करें, नेत्रों के पार्श्व-भाग की यमघण्टा रक्षा करें, और भौंहों के मध्य त्रिशूलधारिणी त्रिनेत्रा चण्डिका रक्षा करें।
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत् कर्णमूले तु शङ्करी ॥ २५॥
śaṅkhinī cakṣuṣormadhye śrotrayordvāravāsinī |
kapolau kālikā rakṣet karṇamūle tu śaṅkarī || 25||
अर्थ दोनों आँखों के बीच में शंखिनी रक्षा करें, कानों की द्वारवासिनी रक्षा करें; कपोलों (गालों) की कालिका और कर्णमूल (कानों की जड़) की शंकरी रक्षा करें।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृताबाला जिह्वायां च सरस्वती ॥ २६॥
nāsikāyāṃ sugandhā ca uttaroṣṭhe ca carcikā |
adhare cāmṛtābālā jihvāyāṃ ca sarasvatī || 26||
अर्थ नासिका की सुगन्धा, ऊपरी होंठ की चर्चिका, निचले होंठ की अमृताबाला (अमृतकला) और जिह्वा की सरस्वती रक्षा करें।
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥ २७॥
dantān rakṣatu kaumārī kaṇṭhadeśe tu caṇḍikā |
ghaṇṭikāṃ citraghaṇṭā ca mahāmāyā ca tāluke || 27||
अर्थ दाँतों की कौमारी रक्षा करें, कण्ठ-प्रदेश (गले) की चण्डिका, घण्टिका (गलतुण्डिका/किलकिली) की चित्रघण्टा और तालु की महामाया रक्षा करें।
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥ २८॥
kāmākṣī cibukaṃ rakṣedvācaṃ me sarvamaṅgalā |
grīvāyāṃ bhadrakālī ca pṛṣṭhavaṃśe dhanurdharī || 28||
अर्थ ठोड़ी की कामाक्षी रक्षा करें, मेरी वाणी की सर्वमंगला, गर्दन (ग्रीवा) की भद्रकाली और रीढ़ की हड्डी (पृष्ठवंश) की धनुर्धरी रक्षा करें।
नीलग्रीवा बहिः कण्ठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ॥ २९॥
nīlagrīvā bahiḥ kaṇṭhe nalikāṃ nalakūbarī |
skandhayoḥ khaḍginī rakṣed bāhū me vajradhāriṇī || 29||
अर्थ गले के बाहरी भाग की नीलग्रीवा रक्षा करें, नलिका (गले की नली/कण्ठनाल) की नलकूबरी, दोनों कंधों की खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें।
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत् कुक्षौ रक्षेन्नरेश्वरी ॥ ३०॥
hastayordaṇḍinī rakṣedambikā cāṅgulīṣu ca |
nakhāñchūleśvarī rakṣet kukṣau rakṣennareśvarī || 30||
अर्थ दोनों हाथों की दण्डिनी रक्षा करें, अंगुलियों की अम्बिका, नखों की शूलेश्वरी और कोख (कुक्षि) की नरेश्वरी रक्षा करें।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥ ३१॥
stanau rakṣenmahādevī manaḥśokavināśinī |
hṛdaye lalitā devī udare śūladhāriṇī || 31||
अर्थ मन के शोक को नष्ट करने वाली महादेवी दोनों स्तनों की रक्षा करें; हृदय की ललिता देवी और उदर (पेट) की शूलधारिणी रक्षा करें।
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
मेढ्रं रक्षतु दुर्गन्धा पायुं मे गुह्यवाहिनी ॥ ३२॥
nābhau ca kāminī rakṣed guhyaṃ guhyeśvarī tathā |
meḍhraṃ rakṣatu durgandhā pāyuṃ me guhyavāhinī || 32||
अर्थ नाभि की कामिनी रक्षा करें, गुह्य (गुप्तांग) की गुह्येश्वरी, मेढ्र (लिंग) की दुर्गन्धा और मेरे पायु (गुदा) की गुह्यवाहिनी रक्षा करें।
कट्यां भगवती रक्षेदूरू मे मेघवाहना ।
जङ्घे महाबला रक्षेत् जानू माधवनायिका ॥ ३३॥
kaṭyāṃ bhagavatī rakṣedūrū me meghavāhanā |
jaṅghe mahābalā rakṣet jānū mādhavanāyikā || 33||
अर्थ कमर (कटि) की भगवती रक्षा करें, मेरी जाँघों की मेघवाहना, पिंडलियों (जंघा) की महाबला और घुटनों (जानु) की माधवनायिका रक्षा करें।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु कौशिकी ।
पादाङ्गुलीः श्रीधरी च तलं पातालवासिनी ॥ ३४॥
gulphayornārasiṃhī ca pādapṛṣṭhe tu kauśikī |
pādāṅgulīḥ śrīdharī ca talaṃ pātālavāsinī || 34||
अर्थ दोनों टखनों (गुल्फ) की नारसिंही रक्षा करें, पैरों की पीठ (ऊपरी भाग) की कौशिकी, पैरों की अंगुलियों की श्रीधरी और तलवों (तल) की पातालवासिनी रक्षा करें।
नखान् दंष्ट्रकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौमारी त्वचं योगीश्वरी तथा ॥ ३५॥
nakhān daṃṣṭrakarālī ca keśāṃścaivordhvakeśinī |
romakūpeṣu kaumārī tvacaṃ yogīśvarī tathā || 35||
अर्थ नखों की दंष्ट्रकराली रक्षा करें, केशों की ऊर्ध्वकेशिनी, रोमकूपों की कौमारी और त्वचा (चमड़ी) की योगीश्वरी रक्षा करें।
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥ ३६॥
raktamajjāvasāmāṃsānyasthimedāṃsi pārvatī |
antrāṇi kālarātriśca pittaṃ ca mukuṭeśvarī || 36||
अर्थ रक्त, मज्जा, वसा (चरबी), मांस, अस्थि और मेद की पार्वती रक्षा करें; अंतड़ियों (अन्त्र) की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें।
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ॥ ३७॥
padmāvatī padmakośe kaphe cūḍāmaṇistathā |
jvālāmukhī nakhajvālāmabhedyā sarvasandhiṣu || 37||
अर्थ पद्मकोश (फेफड़ों के कमल-स्थान) की पद्मावती रक्षा करें, कफ की चूड़ामणि, नखों की कान्ति (नखज्वाला) की ज्वालामुखी और समस्त सन्धियों (जोड़ों) की अभेद्या रक्षा करें।
शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥ ३८॥
śukraṃ brahmāṇī me rakṣecchāyāṃ chatreśvarī tathā |
ahaṅkāraṃ mano buddhiṃ rakṣenme dharmadhāriṇī || 38||
अर्थ मेरे शुक्र (वीर्य) की ब्रह्माणी रक्षा करें, छाया की छत्रेश्वरी, और मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की धर्मधारिणी रक्षा करें।
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत् प्राणान् कल्याणशोभना ॥ ३९॥
prāṇāpānau tathā vyānamudānaṃ ca samānakam |
vajrahastā ca me rakṣet prāṇān kalyāṇaśobhanā || 39||
अर्थ प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान — इन पाँचों प्राणों की वज्रहस्ता तथा कल्याणकारी शोभा वाली देवी रक्षा करें।
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥ ४०॥
rase rūpe ca gandhe ca śabde sparśe ca yoginī |
sattvaṃ rajastamaścaiva rakṣennārāyaṇī sadā || 40||
अर्थ रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श (इन विषयों/इन्द्रियों) में योगिनी रक्षा करें; तथा सत्त्व, रज और तम की नारायणी सदा रक्षा करें।
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु पार्वती ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च सदा रक्षतु वैष्णवी ॥ ४१॥
āyū rakṣatu vārāhī dharmaṃ rakṣatu pārvatī |
yaśaḥ kīrtiṃ ca lakṣmīṃ ca sadā rakṣatu vaiṣṇavī || 41||
अर्थ आयु की वाराही रक्षा करें, धर्म की पार्वती रक्षा करें; तथा यश, कीर्ति और लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) की वैष्णवी सदा रक्षा करें।
गोत्रमिन्द्राणी मे रक्षेत् पशून् रक्षेच्च चण्डिका ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥ ४२॥
gotramindrāṇī me rakṣet paśūn rakṣecca caṇḍikā |
putrān rakṣenmahālakṣmīrbhāryāṃ rakṣatu bhairavī || 42||
अर्थ मेरे गोत्र (कुल/वंश) की इन्द्राणी रक्षा करें, पशुओं की चण्डिका, पुत्रों की महालक्ष्मी और पत्नी की भैरवी रक्षा करें।
धनेश्वरी धनं रक्षेत् कौमारी कन्यकां तथा ।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमङ्करी तथा ॥ ४३॥
dhaneśvarī dhanaṃ rakṣet kaumārī kanyakāṃ tathā |
panthānaṃ supathā rakṣenmārgaṃ kṣemaṅkarī tathā || 43||
अर्थ धन की धनेश्वरी रक्षा करें, कन्या की कौमारी; रास्ते (पन्थ) की सुपथा और मार्ग की क्षेमंकरी रक्षा करें।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सतत स्थिता ।
रक्षाहीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन तु ॥ ४४॥
rājadvāre mahālakṣmīrvijayā satata sthitā |
rakṣāhīnaṃ tu yat sthānaṃ varjitaṃ kavacena tu || 44||
अर्थ राजद्वार (राजा के द्वार) पर महालक्ष्मी और विजया सदा विराजमान रहती हैं। और जो स्थान इस कवच से छूट गया हो तथा रक्षा से रहित हो —
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं कवचं सर्वदा जपेत् ॥ ४५॥
tatsarvaṃ rakṣa me devi jayantī pāpanāśinī |
sarvarakṣākaraṃ puṇyaṃ kavacaṃ sarvadā japet || 45||
अर्थ — हे पापनाशिनी जयन्ती देवी! मेरे उस समस्त (छूटे हुए) भाग की भी रक्षा कीजिए। सर्वप्रकार से रक्षा करने वाले इस पुण्यमय कवच का सदा जप करना चाहिए।
इदं रहस्यं विप्रर्षे भक्त्या तव मयोदितम् ।
पादमेकं न गच्छेत् तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ॥ ४६॥
idaṃ rahasyaṃ viprarṣe bhaktyā tava mayoditam |
pādamekaṃ na gacchet tu yadīcchecchubhamātmanaḥ || 46||
अर्थ हे विप्रर्षि (ब्राह्मणश्रेष्ठ)! यह रहस्य मैंने तुम्हारे प्रति भक्ति के कारण कहा है। जो अपना कल्याण चाहता हो, वह (इस कवच के बिना) एक पग भी न जाए।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ।
तत्र तत्रार्थलाभश्व विजयः सार्वकालिकः ॥ ४७॥
kavacenāvṛto nityaṃ yatra yatraiva gacchati |
tatra tatrārthalābhaśva vijayaḥ sārvakālikaḥ || 47||
अर्थ जो सदा कवच से आवृत (सुरक्षित) रहकर जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन का लाभ और सब समय विजय प्राप्त होती है।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ ४८॥
yaṃ yaṃ cintayate kāmaṃ taṃ taṃ prāpnoti niścitam |
paramaiśvaryamatulaṃ prāpsyate bhūtale pumān || 48||
अर्थ वह जिस-जिस कामना का चिन्तन करता है, वह उसे निश्चय ही प्राप्त होती है। ऐसा पुरुष इस भूतल पर अतुलनीय परम ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ॥ ४९॥
nirbhayo jāyate martyaḥ saṅgrāmeṣvaparājitaḥ |
trailokye tu bhavetpūjyaḥ kavacenāvṛtaḥ pumān || 49||
अर्थ वह मनुष्य निर्भय हो जाता है और संग्रामों में अपराजित रहता है। कवच से सुरक्षित पुरुष तीनों लोकों में पूजनीय हो जाता है।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥ ५०॥
idaṃ tu devyāḥ kavacaṃ devānāmapi durlabham |
yaḥ paṭhetprayato nityaṃ trisandhyaṃ śraddhayānvitaḥ || 50||
अर्थ देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो संयमी होकर श्रद्धापूर्वक नित्य तीनों सन्ध्याओं में इसका पाठ करता है —
दैवीकला भवेत्तस्य त्रैलोक्ये चापराजितः ।
जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥ ५१॥
daivīkalā bhavettasya trailokye cāparājitaḥ |
jīvedvarṣaśataṃ sāgramapamṛtyuvivarjitaḥ || 51||
अर्थ — उसमें दिव्य कला (देवत्व की शक्ति) आ जाती है, वह तीनों लोकों में अपराजित रहता है; तथा वह अपमृत्यु (अकाल-मृत्यु) से रहित होकर पूरे सौ वर्ष से भी अधिक जीता है।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चैव यद्विषम् ॥ ५२॥
naśyanti vyādhayaḥ sarve lūtāvisphoṭakādayaḥ |
sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva kṛtrimaṃ caiva yadviṣam || 52||
अर्थ उसके सभी रोग नष्ट हो जाते हैं — मकड़ी के विष (लूता), फोड़े-फुंसी (विस्फोटक) आदि; और स्थावर (जड़/वानस्पतिक), जंगम (प्राणिज) तथा कृत्रिम — जो भी विष हो —
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचराः खेचराश्चैव कुलजाश्चौपदेशिकाः ॥ ५३॥
abhicārāṇi sarvāṇi mantrayantrāṇi bhūtale |
bhūcarāḥ khecarāścaiva kulajāścaupadeśikāḥ || 53||
अर्थ — पृथ्वी पर के समस्त अभिचार-कर्म (मारण-मोहन आदि टोने), मन्त्र और यन्त्र; भूमि पर विचरने वाले तथा आकाश में विचरने वाले, कुल में उत्पन्न तथा उपदेश से सिद्ध किए गए (प्रेतादि) —
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महारवाः ॥ ५४॥
sahajā kulajā mālā ḍākinī śākinī tathā |
antarikṣacarā ghorā ḍākinyaśca mahāravāḥ || 54||
अर्थ — सहजा, कुलजा, माला (नामक), डाकिनी और शाकिनी, तथा अन्तरिक्ष में विचरने वाली, महाभयंकर और महाशब्द करने वाली घोर डाकिनियाँ —
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥ ५५॥
grahabhūtapiśācāśca yakṣagandharvarākṣasāḥ |
brahmarākṣasavetālāḥ kūṣmāṇḍā bhairavādayaḥ || 55||
अर्थ — ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि (सब पीड़ा देने वाले) —
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचेनावृतो हि यः ।
मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिः परा भवेत् ॥ ५६॥
naśyanti darśanāttasya kavacenāvṛto hi yaḥ |
mānonnatirbhavedrājñastejovṛddhiḥ parā bhavet || 56||
अर्थ — जो कवच से आवृत (सुरक्षित) रहता है, उसके दर्शनमात्र से ये सब नष्ट हो जाते हैं। उस (साधक) को राजा जैसा सम्मान की उन्नति प्राप्त होती है और उसका तेज अत्यधिक बढ़ जाता है।
यशोवृद्धिर्भवेत् पुंसां कीर्तिवृद्धिश्च जायते ।
तस्मात् जपेत् सदा भक्तः कवचं कामदं मुने ॥ ५७॥
yaśovṛddhirbhavet puṃsāṃ kīrtivṛddhiśca jāyate |
tasmāt japet sadā bhaktaḥ kavacaṃ kāmadaṃ mune || 57||
अर्थ मनुष्यों के यश की वृद्धि होती है और उनकी कीर्ति भी बढ़ती है। इसलिए, हे मुनि! भक्त को इस मनोकामना पूर्ण करने वाले कवच का सदा जप करना चाहिए।
जपेत् सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।
निर्विघ्नेन भवेत् सिद्धिश्चण्डीजपसमुद्भवा ॥ ५८॥
japet saptaśatīṃ caṇḍīṃ kṛtvā tu kavacaṃ purā |
nirvighnena bhavet siddhiścaṇḍījapasamudbhavā || 58||
अर्थ पहले कवच का पाठ करके फिर सप्तशती-चण्डी का जप करना चाहिए। इससे चण्डी-जप से उत्पन्न होने वाली सिद्धि निर्विघ्न रूप से प्राप्त होती है।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ॥ ५९॥
yāvadbhūmaṇḍalaṃ dhatte saśailavanakānanam |
tāvattiṣṭhati medinyāṃ santatiḥ putrapautrikī || 59||
अर्थ जब तक यह पर्वतों, वनों और काननों सहित भूमण्डल टिका रहता है, तब तक इस पृथ्वी (मेदिनी) पर उसकी पुत्र-पौत्रादि सन्तति बनी रहती है।
देहान्ते परमं स्थानं सुरैरपि सुदुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ॥ ६०॥
dehānte paramaṃ sthānaṃ surairapi sudurlabham |
prāpnoti puruṣo nityaṃ mahāmāyāprasādataḥ || 60||
अर्थ देह के अन्त में (मृत्यु के पश्चात्) वह पुरुष महामाया की कृपा से देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ उस परम स्थान (धाम) को प्राप्त करता है।
तत्र गच्छति गत्वासौ पुनश्चागमनं नहि ।
लभते परमं स्थानं शिवेन समतां व्रजेत् ॥ ६१॥
tatra gacchati gatvāsau punaścāgamanaṃ nahi |
labhate paramaṃ sthānaṃ śivena samatāṃ vrajet || 61||
अर्थ वह उस परम धाम को प्राप्त करता है, और वहाँ जाकर फिर (संसार में) लौटकर नहीं आता; वह उस परम स्थान को पाकर शिव के साथ समता (एकरूपता) को प्राप्त कर लेता है।
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं
|| iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe hariharabrahmaviracitaṃ
अर्थ समापन-पंक्ति (उपसंहार): "इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराण में हरि, हर और ब्रह्मा द्वारा रचित..." — यह देवी-कवच की समाप्ति सूचित करने वाली पुष्पिका (कोलोफन) है।